Thursday, September 30, 2010

01-10-2010 ka muhurt

आज का सुविचार -
"परिश्रम करने वाले के पास अभाव नहीं रहता है"
उद्योगे नास्ति दरिद्रता         ( चाणक्य नीति ) 
 आज का मुहूर्त - 01-10-2010
संवत -2067
माह - आश्विन कृष्ण पक्ष
तिथि-अष्टमी  दिन -16.00  तक
वार- शुक्रवार 
नक्षत्र - आर्द्रा दिन 16.47   तक
योग-वरीयान 10.58 तक 
चन्द्र राशि- मिथुन 
सूर्य राशि - कन्या 
विशेष योग- सर्वार्थ सिद्धि योग समय   16.47  से     
व्रत - जीवत्पुत्रिका ( जिनके पुत्र नहीं जीवित रहते ऐसे लोगों के लिए यह व्रत बहुत ही लाभ कारी रहता है और जिनके दीर्घायु की कामना हो उनके लिए भी यह व्रत बहुत अच्छा है )
श्राद्ध- अष्टमी ( गया- अष्टमी )

Tuesday, September 28, 2010

आज का पंचांग -29-09-2010

आज का  दिन ( २९.०९.२०१०)
सुविचार - "मन ही मनुष्य के दुःख और सुख का कारण होता है "
माह - अश्विन कृष्ण पक्ष 
दिन - बुधवार 
तिथि - षष्ठी (छठ) सायं ०६.४६ तक 
नक्षत्र - रोहिणी सायं ०५.४१ तक 
योग  - सिद्धि  दोपहर ०२.४५ तक 
विशेष - छठ का श्राद्ध 
आज का मुहूर्त - सर्वार्थ सिद्धि योग पूरा दिन 
                      रवि योग - सायं ०५.४१ से 
आज दोपहर ०३.०० बजे के पहले- नामकरण , दोलारोहन, नवीन वस्त्र धारण,,सुवर्ण रत्न धारण, कृषि कार्य, और व्यापर संबंधी कार्य शुभ होंगे | 

राहु कालम

इसका विचार प्रायः दक्षिण भारत में किया जाता है परन्तु इसका बहुत प्रभाव होने के कारण मै इसे लिखने का प्रयास कर रहा हूँ
राहु काल प्रतिदिन एक निश्चित समय में होता है यह रात्रि में मान्य नहीं है इ जब इसका समय चल रहा हो उस समय कोई भी कार्य प्रारंभ करना अच्छा नहीं होता |




सोमवार                               ०७.३० से ०९.०० तक 
मंगलवार                             १५.००  से १६.४० तक 
बुधवार                                १२.००  से १३.३० तक 
गुरुवार                                १३.३०  से १५.०० तक
शुक्रवार                                १०.३० से १२.०० तक 
शनिवार                               ०९.०० से १०.३०  तक 
रविवार                                १६.३० से १८.००  तक 
इन समयों में प्रतिदिन किसी नए कार्य को न करें ||    

श्राद्ध एक विचार

जीवन की परिसमाप्ति मृत्यु से होती है | इस ध्रुव सत्य को सभी ने स्वीकार किया है और यह प्रत्यक्ष प्रमाण है | जीवात्मा इतना सूक्ष्म है क़ि जब वह शरीर से निकलता है ,उस समय कोई भी मनुष्य उसे अपने इन आँखों से नहीं देख सकता और वही जीवात्मा अपने कर्मों के भोगों को भोगने के लिए एक अंगुष्ठ पर्व परिमित एक सूक्ष्म शरीर धारण करता था 
तत् क्षणात सः अथ गृह्णाति शरीरं चाति वाहकं॥ अङ्गुष्ठपर्व मात्रं तु स्व प्राण रेव निर्मितं ॥
इस अतीन्द्रिय शरीर से ही जीवत्मा अपने द्वारा किये हुये धर्म और अधर्म के परिणाम स्वरूप सुख दुख को भोगता है तथा इसी सूक्ष्म शरीर से पाप करनेवाले मनुष्य 
दक्षिण मार्ग के दंडों को भोगते हुए यम के पास जाता है| हमारे शास्त्रों पुराणों में म्रत्यु के बाद मनुष्य के कल्याण के लिए जो पुन्यात्मक कर्म बताये गए हैं उन्ही को श्राद्ध के नाम से जाना जाता है | यद्यपि यह विषय भी कई बार व्यक्ति के मन में आता है की मरण के बाद मनुष्य का क्या कल्याण? परन्तु हमारे ऋषियों ने इस विषय को भी  स्पष्ट किया है जो हम क्रमशः समझेंगे |
                               
 १ प्रश्न  - श्राद्ध क्या है ? 
उत्तर -पितरों के उद्देश्य से विधिपूर्वक श्रद्धा पूर्वक जो  भी किया जाता है वह ही श्राद्ध है |   श्राद्ध शब्द से ही श्राद्ध की उतपत्ति हुई है | महर्षि पराशर के अनुसार -
देश,काल, तथा पात्र  में हविष्य विधि द्वारा जो कर्म किया जाता है वह ही श्राद्ध है | 
२- श्राद्ध करने से कर्ताका क्या लाभ है ?
उत्तर- कूर्म पुराण में कहा  गया है-
जो मनुष्य विधि पूर्वक ,शांत मन होकर श्राद्ध करता है वह अपने पितरों का आशीर्वाद प्राप्त करता है | परन्तु जिसने यदि जानबूझकर उनके जीवित अवस्था में दुःख का कारन बना है वह श्राद्ध करके भी कल्याण नहीं प्राप्त करता है |
३- श्राद्ध न करने से क्या हानि   होती है ?
शास्त्रों के अनुसार तो बहुत ही कठिन परिणाम बताये गए हैं | व्यक्तिगत मैंने अपने जीवन में देखा है की जो भी या जिसके कुल में श्राद्ध नहीं किया जाता है वह भी अपने पितरों के द्वारा भुक्त कष्टों को भोगता है | अधिकतर वंश परम्परा से प्राप्त रोग भी उन्ही लोगों को होता है जो की अपने माता-पिता का जीवित अवस्था में सम्मान नहीं करते और बाद में उनका श्राद्ध नहीं  करते हैं|
ज्यादातर माता-पिता के मृत्यु का कारन भी उसी वंश में पुनः मृत्यु का कारण बनता है| जो लोग अपने परिजनों का श्राद्ध नहीं करते हैं उन्हें संतान कष्ट भी होता है यदि संतान हो गई तो उससे भी परेशानियाँ होती रहती हैं | क्रमशः ..................    

विवाह में होने वाले विलम्ब के ज्योतिषीय कारण

ज्योतिष में प्रश्न कुण्डली से या जन्मकुंडली से विवाह का विचार सप्तम भाव से किया जाता है | यदि सप्तम भाव का स्वामी शुभ ग्रह बलवान हो तो सप्तम भाव के लिए बहुत ही अच्छा होता है | 
१-जन्मांग में सप्तम स्थान में शनि हो या उसका प्रभाव हो  तो निश्चित ही विवाह में विलम्ब होता है |
२- प्रथम,द्वितीय,चतुर्थ,पंचम,सप्तम,या दशम में से किसी भी स्थान में शनि का प्रभाव हो या फिर शनि ही वहां स्वयं बैठा हो |
३-जन्म कुण्डली में बलवान मंगल का प्रभाव ( १,४,७,८,१२,) हो 
४-लग्न या सप्तम में शनि-शुक्र का एक साथ होना |
५- लग्न या सप्तम में राहु या केतु का प्रभाव हो |
६- सूर्य शनि से प्रभावित होकर सप्तम को देख रहा हो |
७-सप्तम के स्वामी के साथ शनि बैठा हो व उसे पूर्ण दृष्टि से देखता हो |
८- चन्द्र से भी सप्तम भाव के स्वामी के साथ या सप्तम भाव के साथ शनि ,राहु,केतु का पूर्ण प्रभाव हो और उस समय राहु या गुरु की दशा-अन्तर्दशा चल रही हो |
९-सप्तम भाव का स्वामी वक्री,अस्त हो |
१०- सप्तम भाव का स्वामी छठे-अष्टम भाव में हो |
११-सप्तम भाव का स्वामी पंचम भाव में हो |
१२- छठे -अष्टम या द्वादश भाव का स्वामी सप्तम में हो या सप्तम के साथ बैठा हो |
१३-पुरुष की कुण्डली में शुक्र और मंगल कहीं भी एक साथ बैठे हों|
१४-शुक्र-शनि का १-७ का सम्बन्ध हो 
इन सभी स्थितियों  में विवाह में विलम्ब होता है | जब सप्तम का स्वामी बलवान होता है किसी शुभग्रह के साथ होता है तब यह प्रभाव कम होता है | आप इन सभी योगों को अपनी कुण्डली में परख सकते हैं | 

Friday, September 10, 2010

व्रत में कुछ ध्यान देने योग्य बातें

व्रत का अर्थ संकल्प से है हम किसी कार्य को लेकर जब दृढ़संकल्प हो जाते हैं तब वह व्रत कहलाता है |
Sri Lalitha Sahasranamam, Durga Suktamउपवास - उप समीपे वासः - भगवान या अपने लक्ष्य के लिए निरंतर विचार,मन और तन से प्रयास रहना |
व्रत में क्रोध , मोह,लोभ,हिंसा, आदि बैटन से सर्वथा दूर रहना ही उचित होता है|
व्रत में बार-बार जल पीना ज्यादा बोलना , बहस करना,सोना, और उबासी लेना भी मना है|
व्रत में किसी की बुराई करना , किसी का मजाक उड़ाना, भी मना है |
व्रत में अपने इष्ट का ध्यान ,पूजन,जप,हवन,तर्पण शुद्ध विचारों व वस्तुओं से करना चाहिए |
हमेशा प्रकृति की रक्षा करना, किसी भी प्रकार की हानिकारक वस्तुओं से दूर रहना ही व्रत के उत्तम लक्षण है |
व्रत जबरदस्ती ,दिखावे में,आतुरता में ,लोभ में, क्रोध में, किसी का अनिष्ट करने के उद्देश्य से नहीं करना चाहिए|
वह व्रत ही सबसे उत्तम होता है जो दूसरों के कल्याण के लिए , उत्तम विचारों के लिए , शरीर के स्वास्थ्य के लिए किया जाता है |                       
व्रत का तात्पर्य केवल भूखे रहना नहीं है | 
व्रत तो वह परम पवित्र कार्य है जो अपने विचारों को एक सरलता देते हुए हमें कर्म की तरफ प्रेरित करता है 
हमारे देश के जवान हमारी रक्षा के लिए हमेशा तैयार हैं यह भी एक उत्तम और पवित्र व्रत है |
यदि हम अपने देश के लिए हानिकारक कार्य ,विचार और वस्तुओं से दूर रहते हैं तो यह भी एक व्रत है |
कोई गलत न बोलने का , गलत न करने का संकल्प लिया है या ऐसा नहीं करता तो यह भी उत्तम व्रत है |
हम जिस देवता का व्रत करते हैं उस देवता का पूजन करने की अपेक्षा उसको अच्छे लगने वाले विचारों का पालन करें उसके बताये हुए मार्ग पर चलें तो वह देवता तुरन्त प्रसन्न होता है|
देवता वस्तु नहीं कुविचारों का त्याग चाहता है | देवता कोलाहल नहीं शांति चाहता है | देवता आलस्य नहीं कर्म चाहता है | देवता भोग नहीं त्याग चाहता है | जिस दिन हम अपने गलत कार्यों, आदतों को अपने से अलग कर देंगे उस दिन देवता तृप्त हो जायेगा | वह आपको स्वयं देवता बना देगा | इसी लिए हमारे धर्म शास्त्र कहते हैं कि- देवो भूत्वा यजेत देवं - देवता को वस्तु मत दिखाना,भाव.दिखाना, वह मुर्ख नहीं अंधा नहीं है वह सब जनता है  अतः उसके पास वैसे ही जाओ वह खुश होकर वह सब कुछ देगा जो आप चाहते हो जो आपको चाहिए | यदि मेरी बात में विश्वास नहीं तो केवल एक दिन उसके जैसा जीकर देखिये आपका व्रत पूरा हो जायेगा, आपकी साधना सफल हो जायेगी |
धन्यवाद ........................... 

हर तालिका व्रत

Durga Puja Beginnerइसको प्रत्येक स्थान में अलग नामों से भी जाना जाता है | यह व्रत भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि में किया जाता है | सभी व्रत आदि का एक निश्चित नियम और समय भी होता है | उसी तरह यह व्रत भी उसी तृतीया में करना चाहिए जो चतुर्थी तिथि से जुडी हुई हो | इस वर्ष की यह तिथि ११-९-२०१० शनिवार को रहेगी | तभी व्रत करना अच्छा होगा | यह व्रत माता गौरी के लिए किया जाता है ज्यादातर इसको स्त्रियाँ ही करती हैं | इस व्रत को नियम और भक्ति पूर्वक करने से पति को होने वाली परेशानियों से मुक्ति मिलती है | यह व्रत बिना जल अर्थात निर्जल रखने का नियम व परम्परा है | इस दिन मुख्यतः शिव का माता पार्वती के साथ पूजन करना चाहिए |
प्रायशः मिट्टी की मूर्ती बनाकर पूजा करने का नियम है | इस व्रत में माता को शृंगार सामग्री अर्पण की जाती
 हैं | इस व्रत में रात्रि को सोना वर्जित है | रात्रि में जागरण करना और प्रातः देव विसर्जन के बाद पारण करने का नियम है |

Thursday, September 09, 2010

बाल-अरिष्ट योग

भारतीय ज्योतिष में बाल-अरिष्ट के लिए प्रमुख तीन कारणों को स्पष्ट किया गया है |
१ गंड-अरिष्ट
२-ग्रह-अरिष्ट
३- पताकी-अरिष्ट
जिन अरिष्टों में हम ग्रह-अरिष्ट का प्रथम विचार करते हैं -
१-यदि चारोँ केन्द्रों में क्रमशः चन्द्र,मंगल,शनि,और सूर्य बैठा हो तो बालक के लिए अरिष्ट होता है |
२-यदि लग्न में चन्द्र बारहवें स्थान में शनि,नवम में सूर्य और अष्टम में मंगल हो तो ऐसे जातक को अरिष्ट होता है|
३-चंद्रमा किसी भाव में भी किसी पापग्रह के साथ बैठा हो तो और उस पर किसी शुभ ग्रह क़ि उस पर दृष्टि न हो तो बालक के लिए बहुत ही शीघ्र अरिष्ट होता है |
४-क्षीण चन्द्र यदि लग्न में बैठा हो तो और अष्टम तथा केंद्र में कोई शुभ ग्रह न हो तो एक मास के अन्दर जातक के लिए अरिष्ट होता है |
क्रमशः --

Friday, September 03, 2010

काल सर्प योग के बुरे प्रभाव

  • जब राहु के साथ चंद्रमा लग्न में हो और जातक को बात-बात में भ्रम की बिमारी सताती रहती हो, या उसे हमेशा लगता है कि कोई उसे नुकसान पहुंचा सकता है या वह व्यक्ति मानसिक तौर पर पीड़ित रहता है।
  • जब लग्न में मेष, वृश्चिक, कर्क या धनु राशि हो और उसमें बृहस्पति व मंगल स्थित हों, राहु की स्थिति पंचम भाव में हो तथा वह मंगल या बुध से युक्त या दृष्ट हो, अथवा राहु पंचम भाव में स्थित हो तो संबंधित जातक की संतान पर कभी न कभी भारी मुसीबत आती ही है, अथवा जातक किसी बड़े संकट या आपराधिक मामले में फंस जाता है।
  • जब कालसर्प योग में राहु के साथ शुक्र की युति हो तो जातक को संतान संबंधी ग्रह बाधा होती है।
  • जब लग्न व लग्नेश पीड़ित हो, तब भी जातक शारीरिक व मानसिक रूप से परेशान रहता है।
  • चंद्रमा से द्वितीय व द्वादश भाव में कोई ग्रह न हो। यानी केंद्रुम योग हो और चंद्रमा या लग्न से केंद्र में कोई ग्रह न हो तो जातक को मुख्य रूप से आर्थिक परेशानी होती है।
  • जब राहु के साथ बृहस्पति की युति हो तब जातक को तरह-तरह के अनिष्टों का सामना करना पड़ता है।
  • जब राहु की मंगल से युति यानी अंगारक योग हो तब संबंधित जातक को भारी कष्ट का सामना करना पड़ता है।
  • जब राहु के साथ सूर्य या चंद्रमा की युति हो तब भी जातक पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है, शारीरिक व आर्थिक परेशानियां बढ़ती हैं।
  • जब राहु के साथ शनि की युति यानी नंद योग हो तब भी जातक के स्वास्थ्य व संतान पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है, उसकी कारोबारी परेशानियां बढ़ती हैं।
  • जब राहु की बुध से युति अर्थात जड़त्व योग हो तब भी जातक पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है, उसकी आर्थिक व सामाजिक परेशानियां बढ़ती हैं।
  • जब अष्टम भाव में राहु पर मंगल, शनि या सूर्य की दृष्टि हो तब जातक के विवाह में विघ्न, या देरी होती है।
  • यदि जन्म कुंडली में शनि चतुर्थ भाव में और राहु बारहवें भाव में स्थित हो तो संबंधित जातक बहुत बड़ा धूर्त व कपटी होता है। इसकी वजह से उसे बहुत बड़ी विपत्तिा में भी फंसना पड़ जाता है।
  • जब लग्न में राहु-चंद्र हों तथा पंचम, नवम या द्वादश भाव में मंगल या शनि अवस्थित हों तब जातक की दिमागी हालत ठीक नहीं रहती। उसे प्रेत-पिशाच बाधा से भी पीड़ित होना पड़ सकता है।
  • जब दशम भाव का नवांशेश मंगल/राहु या शनि से युति करे तब संबंधित जातक को हमेशा अग्नि से भय रहता है और अग्नि से सावधान भी रहना चाहिए।
  • जब दशम भाव का नवांश स्वामी राहु या केतु से युक्त हो तब संबंधित जातक मरणांतक कष्ट पाने की प्रबल आशंका बनी रहती है।
  • जब राहु व मंगल के बीच षडाष्टक संबंध हो तब संबंधिात जातक को बहुत कष्ट होता है। वैसी स्थिति में तो कष्ट और भी बढ़ जाते हैं जब राहु मंगल से दृष्ट हो।
  • जब लग्न मेष, वृष या कर्क हो तथा राहु की स्थिति 1ए 3ए 4ए 5ए 6ए 7ए 8ए 11 या 12वें भाव में हो। तब उस स्थिति में जातक स्त्री, पुत्र, धन-धान्य व अच्छे स्वास्थ्य का सुख प्राप्त करता है।
  • जब राहु छठे भाव में अवस्थित हो तथा बृहस्पति केंद्र में हो तब जातक का जीवन खुशहाल व्यतीत होता है।
  • जब राहु व चंद्रमा की युति केंद्र (1ए 4ए 7ए 10वें भाव) या त्रिकोण में हो तब जातक के जीवन में सुख-समृध्दि की सारी सुविधाएं उपलब्ध हो जाती हैं।
  • जब शुक्र दूसरे या 12वें भाव में अवस्थित हो तब जातक को अनुकूल फल प्राप्त होते हैं।
  • जब बुधादित्य योग हो और बुध अस्त न हो तब जातक को अनुकूल फल प्राप्त होते हैं।
  • जब लग्न व लग्नेश सूर्य व चंद्र कुंडली में बलवान हों साथ ही किसी शुभ भाव में अवस्थित हों और शुभ ग्रहों द्वारा देखे जा रहे हों। तब कालसर्प योग की प्रतिकूलता कम हो जाती है।
  • जब दशम भाव में मंगल बली हो तथा किसी अशुभ भाव से युक्त या दृष्ट न हों। तब संबंधित जातक पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ता।
  • जब शुक्र से मालव्य योग बनता हो, यानी शुक्र अपनीराशि में या उच्च राशि में केंद्र में अवस्थित हो और किसी अशुभ ग्रह से युक्त अथवा दृष्ट न हो रहा हों। तब कालसर्प योग का विपरत असर काफी कम हो जाता है।
  • जब शनि अपनी राशि या अपनी उच्च राशि में केंद्र में अवस्थित हो तथा किसी अशुभ ग्रह से युक्त या दृष्ट न हों। तब काल सर्प योग का असर काफी कम हो जाता है।
  • जब मंगल की युति चंद्रमा से केंद्र में अपनी राशि या उच्च राशि में हो, अथवा अशुभ ग्रहों से युक्त या दृष्ट न हों। तब कालसर्प योग की सारी परेशानियां कम हो जाती है।
  • जब राहु अदृश्य भावों में स्थित हो तथा दूसरे ग्रह दृश्य भावों में स्थित हों तब संबंधित जातक का कालसर्प योग समृध्दिदायक होता है।
  • जब राहु छठे भाव में तथा बृहस्पति केंद्र या दशम भाव में अवस्थित हो तब जातक के जीवन में धन-धान्य की जरा भी कमी महसूस नहीं होती।




पाराशरीय धनदायक योग


ज्योतिषशास्त्र के पितामह महर्षि पाराशर ने अपने सुप्रसिद्ध ग्रंथ "वृहत पाराशर" में जिस धन मान और सुख देने वाले राजयोग का उपदेश दिया है,उस योग का ज्योतिष संसार में सार्वभौम आदर ही उस योग की महत्ता और गौरव का एक प्रयाप्त प्रमाण है.महर्षि पाराशर का आदेश है,कि जैसे भगवान विष्णु के अवतरण समय पर उनकी शक्ति लक्ष्मी उनसे मिलती है,तो संसार में उपकार की सृष्टि होती है.इसी प्रकार जब केंद्र घरों के स्वामियों का योग त्रिकोण घरों के स्वामियों से होता है,अथवा जब एक ही ग्रह जब केंद्र और त्रिकोण का दोनों का स्वामी हो जाता है,तो इस योग अथवा संबन्ध के फ़लस्वरूप उच्च पदवी,मान,यश तथा विशेष धन की प्राप्ति होती है.यदि यह केन्द्र और त्रिकोण का स्वामी जिसको ज्योतिष की परिभाषा में राजयोग कारक ग्रह कहते हैं,तनिक भी बलवान हो तो अपनी दशा और विशेषतया अपनी अन्तर्दशा में निश्चित रूप से धन पदवी तथा मान में वृद्धि करता है.यह बात अनुभव में भी है और पत्थर की लकीर भी है

अपराध योग

अपराध अनेक प्रकार के होते हैं। इस बिन्दु के अन्तर्गत सभी को परिभाषित करना दुस्कर कार्य है। लग्न महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा करता है। लग्न ही मनुष्य की स्वाभाविक प्रवृत्ति है, जो उस जातक के अहं को उकसाती है। छठा भाव मनुष्य के आन्तरिक पाप का है और असामाजिक तत्त्व पैदा करता है। अष्टम भाव उस अपराध के क्रियाकलाप से सम्बन्धित है और नवम भाव से उसका परिणाम प्रभावित होता है। (क) लग्नेश व द्वादशेश अष्टमस्थ हो, षष्ठेश लग्नस्थ, अष्टमेश नवम में तथा राहु द्वादश भाव में हो तो जातक अपराध करता है। (ख) नेपच्यून वक्री हो, सप्तमेश चन्द्रमा दो अशुभ ग्रहो के साथ अशुभ भाव में हो तो जातक अपनी पत्नी का कत्ल कर देता है। अथवा लग्न में नेपच्यून हो, यूरेनस उससे समकोण पर हो, शुक्र और वक्री मंगल आमने-सामने हो, चन्द्र और शनि भी आमने-सामने हो, बृहस्पति सूर्य से समकोण पर हो और शनि लग्न से चतुर्थ स्थान पर हो।


अनफा योग

चन्द्रमा से द्वादशस्थ कोई ग्रह हो, किन्तु द्वितीय स्थान ग्रह शुन्य हो तो उसे ‘अनफा योग’ कहते हैं। यहाँ सूर्य को छोड़ कर अन्य ग्रहों की उपस्थिति अपेक्षित है। ‘यवन’ के कथनानुसार यदि चन्द्रमा से दशम में सूर्यातिरिक्त कोई ग्रह हो तो ‘अनफा योग होता है। ‘अनफा’ योग वाला जातक शीलवान्, कीर्त्ति-ख्याति वाला, सांसारिक विषयों से सुखी, सन्तोषी, शरीर से पुष्ट और स्वस्थ होता है। अनफा योग में चन्द्रमा से द्वादस्थ ग्रहों का फलादेश यदि चन्द्रमा से मंगल द्वादस्थ हो तो जातक रणोत्सुक, क्रोधी, मानी और डाकुओं का सरदार होता है। परन्तु उसका रूप आकर्षक होता है। यदि बुध हो तो वह चित्रकारी, गान-विद्या का व्याख्याता, विद्वान् वक्ता, यशस्वी, सुन्दर और राजा से सम्मानित होता है। यदि बृहस्पति हो तो जातक अत्यन्त मेधावी, गम्भीर, गुणज्ञ, शुद्ध व्यावहारिक, धनी एवं मानी और राजा से सम्मानित होता है। यदि शुक्र हो तो जातक स्त्रियों के लिये चित्ताकर्षक होता है। अत्यन्त बुद्धिमान्, धन से सम्पन्न और बहुतेरे पशुओं का स्वामी भी होता है। शनि हो तो जातक आजानु-बाहु, गुणवान्, नेता, पश्वादियों का स्वामी होता है और ऐसे जातक की वाणी सर्व-ग्रहिणी होती हैं परन्तु इसका विवाह किसी एक दुष्टा स्त्री से होता है।


अकस्मात् धन नाश

(क) दूसरे भाव में कर्क का चन्द्रमा शनि के नक्षत्र पर स्थित हो और अष्टम भाव में स्वगृही शनि चन्द्र के नक्षत्र पर स्थित हो, दोनों की परस्पर पूर्ण दृष्टि होने से, (ख) शनि की महादशा में चन्द्रमा का अन्तर आने से धन नष्ट हो,या (ग) भाग्येश और दशमेश व्यय भाव में हों। (घ) यदि धन भाव में कर्क का चन्द्रमा (मिथुन लग्न) हो तथा अष्टम भाव में शनि स्वगृही हो तो परस्पर महादशा अन्तर्दशा में जातक दिवालिया हो जाता है।

अकस्मात् धन प्राप्ति योग

(क) यदि द्वितीयेश और चतुर्थेश शुभ ग्रह (बुध-शुक्र) की राशि में शुभग्रहों से युत या दृष्ट हो। (ख) पंचम भाव में चन्द्रमा पर शुक्र की पूर्ण दृष्टि हो। (ग) 1, 2, 11 वें भाव के स्वामियों में लग्न का स्वामी दूसरे घर में, दूसरे का स्वामी ग्यारहवें में तथा ग्यारहवें का स्वामी लग्न में हो। (घ) एकादशेश और द्वितीयेश चतुर्थस्थ होंऔर चतुर्थेश शुभग्रह की राशि में शुभयुत या दृष्ट। (ङ) धनेश अष्टम भाव में हो। (च) लग्न का स्वामी धनस्थान में हो, लाभ-स्थान में हो और लाभेश लग्न में हो। (जातक पारिजात) (छ) लग्नेश शुभग्रह हो और धन स्थान में स्थित हो या धनेश आठवें स्थान में हो। (ज) यदि पंचम स्थान में शुक्र से दृष्ट चन्द्रमा हो। (झ) यदि धन भाव का स्वामी शनि (धनु, मकर लग्न) 4, 8 या 12वें भाव में हो तथा बुध सप्तम भाव में स्वगृही होकर बैठा हो

Thursday, September 02, 2010

पञ्च महा-पुरुष योग

रुचक योग -
यह योग मंगल के द्वारा बनता है -
यदि मंगल के मेष,वृश्चिक , मकर में (उच्च अंशों में ) हो तो यह योग होता है | यह योग और भी प्रभावी होता है जब यह केंद्र में बनता है | मेरे अनुभव में यदि यह योग दशम में हो और अधिक प्रभावी होता है | 
मंगल के द्वारा बनने वाला यह योग मंगल के प्रभाव को बढाता है | यदि यह योग मेष-कर्क-सिंह-मकर-और मीन राशियों में सबसे उत्तम फल देता है और धनु-वृश्चिक लग्नों में इसका मध्यम फल होता है | शेष अन्य लग्नों में 
इसका फल बहुत अच्छा नहीं होता है | 
अन्य अगले भाग में .................................