Wednesday, February 16, 2011

विवाह से पूर्व प्रश्न कुण्डली से जानिए भावी दम्पत्ति का स्वभाव (Know the nature of the married couple through Horary astrology)

jविवाह के बाद पति पत्नी में उनके व्यवहार और स्वभाव को लेकर बात बहुत आगे बढ़ जाती है. प्रश्न कुण्डली से लड़का लड़की का स्वभाव अगर विवाह से पहले ही देख लिया जाए तो विवाह के बाद आने वाली कई परेशानियों से बचाव हो सकता है.
विवाह के लिए लड़का लड़की की कुण्डली में ग्रह स्थिति (Placement of planets in the kundalis)
विवाह के लिए कुण्डली में गुरू और शुक्र को कारण ग्रह के रूप में देखा जाता है. प्रश्न कुण्डली में इस विषय के लिए पुरूष की कुण्डली में शुक्र और चन्द्र को देखा जाता है और स्त्री की कुण्डली में सूर्य और मंगल को देखा जाता है. अगर इनकी स्थिति शुभ कुण्डली में शुभ नहीं है तो वैवाहिक जीवन में कठिनाई का संकेत प्राप्त होता है. व्यक्ति के स्वभाव और चरित्र को लग्न से देखा जाता है (Ascendant is analysed to predict the person's nature) एवं वैवाहिक जीवन की स्थितियों को सप्तम, एकादश और द्वितीय भाव से देखा जाता है. अगर कुण्डली में सप्तम, एकादश और द्वितीय भाव अशुभ प्रभाव में हो और लग्न में पाप ग्रह हो अथवा सप्तम में पाप ग्रह स्थित हो कर लग्न को देख रहा हो तब व्यक्ति का चरित्र और स्वभाव वैवाहिक जीवन में परेशानियों का कारण होता है. विवाह के संदर्भ में मंगल भी काफी महत्वपूर्ण होता है. इसकी दृष्टि और उपस्थिति भी कई बार वैवाहिक सुख में व्यवधान का कारण होता है.

प्रश्न कुण्डली में लड़का लड़की का का स्वभाव और चरित्र (The character and nature of the persons through Prashna Kundali)
प्रश्न कुण्डली में कुछ ऐसे ग्रह स्थितियों का वर्णन किया गया है जिन्हें देखकर इस बात का अंदाजा आसानी से लगाया जा सकता है कि व्यक्ति का स्वभाव और चरित्र कैसा है. प्रश्न कुण्डली के अनुसार जब लड़का लड़की के चरित्र के विषय में जानने के लिए प्रश्न पूछा जाता है तब कुण्डली में अगर मंगल और शुक्र की युति बनती है अथवा शुक्र और मंगल के बीच दृष्टि सम्बन्ध बनता है तो यह इस बात का संकेत होता है कि अपने चरित्र और व्यवहार के कारण वैवाहिक जीवन में पति पत्नी एक दूसरे के प्रति पूर्ण समर्पित नहीं होंगे. चन्द्रमा सातवें घर में मंगल और राहु के साथ बैठा हो (when moon is in the seventh house with mars and rahu) और सप्तमेश एवं शुक्र पर मंगल अथवा शनि की अशुभ दृष्टि हो तो पति पत्नी में नैतिकता का अभाव होता है. द्वितीय, छठे, सातवें, आठवें और बारहवें भाव के स्वामी कुण्डली में कहीं भी युति बनाते है तो चंचल स्वभाव का संकेत मिलता है. पति पत्नी में समर्पण भाव का अभाव उस स्थिति में भी होता है जब बुध और शुक्र की युति चतुर्थ भाव में होती है और चतुर्थ भाव को शनि देख रहा होता हो.

पति पत्नी के चरित्र के विषय में प्रश्न कुण्डली का उदाहरण (Example of marriage from the prashna kundali)

मनोज की शादी की बात काफी हद तक आगे बढ़ चुकी थी. लेकिन मनोज के माता पिता के मन में यह बात घूम रही थी कि पता नहीं लड़की कैसी और उसका स्वभाव कैसा है. अपनी जिज्ञासा को शांत करने के लिए इन्होंने प्रश्न कुण्डली से इस विषय का उत्तर जानना चाहा. 23 मई 2009 को 5 बजकर 12 मिनट पर इन्होंने अपना प्रश्न किया किया. लग्न निर्धारण के लिए इन्होंने कृष्णमूर्ति पद्धति से 1 से 249 तक दिये गये अंक में अंक 19 को चुना और वैदिक पद्धति के अनुसार 1 से 108 मे अंक 7 को चुना. इस प्रकार इनकी प्रश्न कुण्डली तैयार हुई. कुण्डली में लग्न आया तुला जिसका स्वामी है शुक्र. राशि है मेष जिसका स्वामी है मंगल.  नक्षत्र है भरणी जिसका स्वामी है शुक्र. इनकी प्रश्न कुण्डली में छठे भाव में मंगल और शुक्र की युति बन रही है. लग्न भाव में शनि की दृष्टि है. तुला लग्न की कुण्डली होने से शनि अपनी अशुभता नहीं देगा लेकिन छठे भाव में शुक्र मंगल की युति के कारण पति पत्नी दोनों ही स्वतंत्र विचार के होंगे.

विवाह के लिए प्रश्न कुण्डली में ग्रह स्थिति (The position of planets in the Prashna kundali)


विवाह के लिए प्रश्न कुण्डली में सप्तम, द्वितीय और एकादश भाव को देखा जाता है.विवाह के कारक ग्रह के रूप में पुरूष की कुण्डली में शुक्र और चन्द्रमा (Venus are Moon are the karakas for marriage for males) को देखा जाता है जबकि स्त्री की कुण्डली में मंगल और सूर्य को देखा जाता है (Mars and Sun are marriage karakas for females)
.गुरू भी स्त्री की कुण्डली में विवाह के विषय में महत्वपूर्ण होता है.सप्तम भाव में शुभ ग्रह स्थित हो और एकादश एवं द्वितीय भाव भी शुभ प्रभाव में हो तो विवाह लाभप्रद और सुखमय होने का संकेत माना जाता है.अगर नवम भाव का स्वामी सप्तम भाव में शुभ प्रभाव में होता है तो विवाह के पश्चात व्यक्ति को अधिक कामयाबी मिलती है.नवम भाव का स्वामी चन्द्रमा अगर सप्तम में गुरू से युति सम्बन्ध बनता है चन्द को देखता है तो विवाह के पश्चात जीवन अधिक सुखमय हो सकता है ऐसी संभावना व्यक्त की जाती है.

प्रश्न कुण्डली में लाभप्रद वैवाहिक सम्बन्ध के लिए ग्रह स्थिति (Astrological Combinations for a fruitful married life)
जब प्रश्नकर्ता प्रश्न कुण्डली से यह पूछता है कि वैवाहिक सम्बन्ध लाभप्रद होगा अथवा नहीं.इस प्रश्न के उत्तर में प्रश्न कुण्डली में अगर चन्द्रमा तृतीय, पंचम, दशम अथवा एकादश भाव में हो और गुरू चन्द्र को देखता है तो वैवाहिक सम्बन्ध लाभप्रद होने की पूरी संभावना व्यक्त की जाती है (Marriage is fruitful if the Moon is in 3rd, 5th, 10th or 11th houses and aspecting jupiter).लग्न स्थान में चन्द्रमा अथवा शुक्र तुला, वृष या कर्क राशि हो बैठा हो और गुरू  गुरू अपनी शुभ दृष्टि से लग्न को देखता हो तो वैवाहिक सम्बन्ध फायदेमंद हो सकता है.अष्टम भाव का स्वामी प्रश्न कुण्डली में अगर पीड़ित नहीं हो तो आर्थिक रूप से सम्पन्न परिवार में विवाह होता है और सम्बन्ध से लाभ मिलता है.अष्टम भाव में अगर गुरू, शुक्र या राहु भी हो तो इसे और भी शुभ संकेत माना जाता है.

प्रश्न कुण्डली में लाभप्रद वैवाहिक सम्बन्ध का उदाहरण (Example of astrological combinations for fruitful marriage)
अतुल का अपना कारोबार है.इनकी शादी की बात चल रही है.इनके मन में इस बात को लेकर आशंका है कि जो वैवाहिक सम्बन्ध होने जा रहा है क्या वह इनके लिए लाभप्रद होगा.अपनी जिज्ञासा लेकर अतुल 23 मई 2009 को 1 बजकर 5 सेकेण्ड पर प्रश्न कुण्डली से सवाल पूछते हैं कि, क्या यह वैवाहिक सम्बन्ध फायदेमंद होगा.लग्न निर्धारण हेतु इन्होंने कृष्णमूर्ति पद्धति के अनुसार दिये गये 1से 249 अंक में अंक 15 का चयन किया और वैदिक पद्धति के अनुसार 1 से 108 में 16 अंक का चयन किया.इस प्रकार प्रश्न की कुण्डली तैयार हुई.इस कुण्डली में  सिह  लग्न उपस्थित है जिसका स्वामी सूर्य है.राशि है कन्या जिसका स्वामी बुध है.नक्षत्र है भरणी जिसका स्वामी है शुक्र.कुण्डली का विश्लेषण करने से मालूम होता है कि अतुल के लिए यह वैवाहिक सम्बन्ध लाभप्रद होने की संभावना कम है क्योकि लग्न में पाप ग्रह शनि बैठा है (the malefic planet saturn is in the ascendant).दूसरी स्थिति यह भी है कि दशमेश शनि लग्न में शत्रु ग्रह की राशि में है अत: अनुकूल परिणाम की संभावना कम दिखाई देती है.प्रश्न की कुण्डली में अष्टमेश गुरू और द्वितीयेश बुध दोनों एक दूसरे से 90 डिग्री पर हैं जो इस विवाह सम्बन्ध से लाभ की संभावना से इंकार कर रहे हैं

Saturday, February 12, 2011

जैमिनी ज्योतिष से व्यक्तित्व एवं रूप-रंग का विचार (Analysing Personality and Looks Through Jaimini Jyotish)


चन्द्रमा और राहु लग्न अथवा आत्मकारक से नौवें घर में स्थित होने से (Moon in 8th House from Atmakaraka) व्यक्ति कमजोर होता है. लग्न स्थान मंगल द्वारा दृष्ट होने पर व्यक्ति का स्वभाव क्रोधी होता है वह छोटी-छोटी बातों पर उग्र हो उठता है.
व्यक्ति की राशि में कारकांश ग्रह मीन राशि में होने पर (Karakamsha Planet in Pisces) व्यक्ति गुणवान होता है और दूसरों के लिए आदर्श स्वरूप होता है जबकि केतु का सम्बन्ध कारकांश से होने पर व्यक्ति में धर्माचरण की कमी होती है लेकिन अपने अच्छे होने का दिखावा ज्यादा करता है. सूर्य और राहु कारकांश में हो तथा उन्हें मंगल देख रहा हो तो यह इस बात का संकेत होता है कि व्यक्ति क्रोधी होगा. कारकांश से दसवें घर में बुध स्थित (Mercury in 10th house from Karakamsh) हो तथा उस पर किसी शुभ ग्रह की दृष्टि हो तो व्यक्ति काफी बुद्धिमान होता है.

जैमिनी ज्योतिष यह भी कहता है कि जिस व्यक्ति की कुण्डली में कारकांश से तीसरे घर में अशुभ ग्रह होता है (Malefic in 3rd house from Karakamsh) वह आत्मविश्वासी होता है. उनमें उर्जा व साहस भी भरपूर रहता है. वे अपने बल पर अपना भविष्य स्वयं बनाने वाले होते हैं. जबकि, अशुभ ग्रह कारकांश से पांचवें और नवमें घर में स्थित होता है तथा उसे कोई अशुभ ग्रह देखता है तो व्यक्ति का जीवन सामान्य रहता है. उन लोगों को जनसमूह एवं रैली से घबराहट महसूस होती है जिनकी कुण्डली में शनि कारकांश अथवा इससे पांचवें घर में होता है. जिन लोगों की कुण्डली में केतु कारकांश से दूसरे घर में होता है और अशुभ ग्रह उसे देखते हैं वह साफ और स्पष्ट बोलने की बजाय बातों को छुपाने की कोशिश करते हैं. आमतौर पर वह लोग बुद्धिमान होते हैं जिनकी कुण्डली में पांचवें घर के स्वामी का आत्मकारक अथवा लग्न से दृष्टि सम्बन्ध बनता है (Aspect of Fifth lord on Atmakarak). वे लोग गम में भी मुस्कुराने वाले होते हैं जिनकी जन्मपत्री में लग्न एवं आत्मकारक से चौथे घर के स्वामी की दृष्टि लग्न तथा आत्मकारक पर होती है, इनका चरित्र भी ऊँचा रहता है. आत्मकारक एवं लग्न से बारहवें घर के स्वामी की दृष्टि लग्न एवं आत्मकारक पर होना यह बताता है कि व्यक्ति खुले हाथों से खर्च करने वाला होगा.

ग्रहों की स्थिति और त्वचा का रंग (Jaimini Jyotish and Appearance)
जैमिनी ज्योतिष में व्यक्ति के शारीरिक गठन, लक्षण तथा रंग-रूप का विचार नवमांश, कारकांश एवं वरन्दा लग्न (Varanda Lagna) के स्वामी से किया जात है. वरन्दा लग्न को व्यक्ति के रूप-रंग के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है. इस ज्योतिषीय विधि में बताया गया है कि अगर केतु और शनि लग्न में हो, नवमांश लग्न, कारकांश या वरन्दा लग्न (Saturn in Varanda Ascendant)  में हो तो व्यक्ति की त्वचा का रंग लालिमा लिये होता है. जबकि शनि की युति शुक्र या राहु से होने पर व्यक्ति दिखने में सांवला होता है. उन लोगों की त्वचा निली आभा लिये होती है जिनकी कुण्डली में शनि के साथ बुध की युति बनती है. अगर आपकी कुण्डली में मंगल व शनि की युति लग्न, नवमांश लग्न, कारकांश या वरन्दा लग्न में बन रही है तो आपकी त्वचा का रंग लाल और पीली आभा लिए होगी. वहीं गुरू के साथ शनि की युति होने से आप अत्यंत गोरे हो सकते हैं. चन्द्र के साथ शनि की युति होने से भी आपकी त्वचा निखरी होती है.

प्राणपद और अरूधा लग्न का रंग रूप पर प्रभाव (Effect of Pranapada and Arudha Lagna on Appearance)
कन्या लग्न में प्राणपद होने से व्यक्ति बाहर से रूखा नज़र आता है लेकिन हृदय से दयालु व नम्र होता है. खान-पान में मीठा इन्हें अधिक पसंद होता है. प्राणपद मकर राशि में होने पर व्यक्ति की त्वचा का रंग साफ व लालिमा लिये होता है. सिंह राशि में प्राणपद (Pranapada in Leo Moonsign)  होने से व्यक्ति व्यक्ति दिखने में बहुत आकर्षक नहीं होता है. इसी प्रकार का परिणाम तब भी मिलता है जब उपपद से दूसरे घर में शनि होता है एवं उपपद से सातवें घर का स्वामी लग्न में होता है. वे लोग अपनी उम्र से अधिक नज़र आते हैं जिनकी कुण्डली में केतु अरूधा लग्न से दूसरे घर में विराजमान होता है (Ketu in 2nd house from Arudha Lagna). जिनकी कुण्डली में बुध एवं शुक्र की स्थिति दूसरे अथवा पांचवें घर में होती है उनके होंठ एवं जबड़े दिखने में अच्छे नहीं होते हैं जिससे उनकी मुस्कान में आकर्षण की कमी रहती है.

विवाह समय निर्धारण - Calculating the time of marriage through Mahadasha


विवाह समय निर्धारण के लिये सबसे पहले कुण्डली में विवाह के योग देखे जाते है. इसके लिये सप्तम भाव, सप्तमेश व शुक्र से संबन्ध बनाने वाले ग्रहों का विश्लेषण किया जाता है. जन्म कुण्डली में जो भी ग्रह अशुभ या पापी ग्रह होकर इन ग्रहों से दृ्ष्टि, युति या स्थिति के प्रभाव से इन ग्रहों से संबन्ध बना रहा होता है. वह ग्रह विवाह में विलम्ब का कारण बन रहा होता है.
इसलिये सप्तम भाव, सप्तमेश व शुक्र पर शुभ ग्रहों का प्रभाव जितना अधिक हो, उतना ही शुभ रहता है (Higher influence of the auspicious planets is good for marriage). तथा अशुभ ग्रहों का प्रभाव न होना भी विवाह का समय पर होने के लिये सही रहता है. क्योकि अशुभ/ पापी ग्रह जब भी इन तीनों को या इन तीनों में से किसी एक को प्रभावित करते है. विवाह की अवधि में देरी होती ही है.

जन्म कुण्डली में जब योगों के आधार पर विवाह की आयु निर्धारित हो जाये तो, उसके बाद विवाह के कारक ग्रह शुक्र (Venus is the Karak planet for marriage) व विवाह के मुख्य भाव व सहायक भावों की दशा- अन्तर्दशा में विवाह होने की संभावनाएं बनती है. आईये देखे की दशाएं विवाह के समय निर्धारण में किस प्रकार सहयोग करती है:-

1. सप्तमेश की दशा- अन्तर्दशा में विवाह- (Marriage in the Mahadasha-Antardasha of Seventh Lord)
जब कुण्डली के योग विवाह की संभावनाएं बना रहे हों, तथा व्यक्ति की ग्रह दशा में सप्तमेश का संबन्ध शुक्र से हो तों इस अवधि में विवाह होता है. इसके अलावा जब सप्तमेश जब द्वितीयेश के साथ ग्रह दशा में संबन्ध बना रहे हों उस स्थिति में भी विवाह होने के योग बनते है.

2. सप्तमेश में नवमेश की दशा- अन्तर्द्शा में विवाह (Marriage in the Mahadasha-Antardasha of Ninth Lord in Seventh Lord)
ग्रह दशा का संबन्ध जब सप्तमेश व नवमेश का आ रहा हों तथा ये दोनों जन्म कुण्डली में पंचमेश से भी संबन्ध बनाते हों तो इस ग्रह दशा में प्रेम विवाह होने की संभावनाएं बनती है.

3. सप्तम भाव में स्थित ग्रहों की दशा में विवाह (Marriage in the Dasha of the planets in the seventh house)
सप्तम भाव में जो ग्रह स्थित हो या उनसे पूर्ण दृष्टि संबन्ध बना रहे हों, उन सभी ग्रहों की दशा - अन्तर्दशा में विवाह हो सकता है.  इसके अलावा निम्न योगों में विवाह होने की संभावनाएं बनती है:-
  • क)  सप्तम भाव में स्थित ग्रह, सप्तमेश जब शुभ ग्रह होकर शुभ भाव में हों तो व्यक्ति का विवाह संबन्धित ग्रह दशा की आरम्भ की अवधि में विवाह होने की संभावनाएं बनाती है. या
  • ख) शुक्र, सप्तम भाव में स्थित ग्रह या सप्तमेश जब शुभ ग्रह होकर अशुभ भाव या अशुभ ग्रह की राशि में स्थित होने पर अपनी दशा- अन्तर्दशा के मध्य भाग में विवाह की संभावनाएं बनाता है.
  • ग) इसके अतिरिक्त जब अशुभ ग्रह बली होकर सप्तम भाव में स्थित हों या स्वयं सप्तमेश हों तो इस ग्रह की दशा के  अन्तिम भाग में विवाह संभावित होता है.
4. शुक्र का ग्रह दशा से संबन्ध होने पर विवाह (Marriage in the dasha related to Venus)
जब विवाह कारक ग्रह शुक्र नैसर्गिक रुप से शुभ हों, शुभ राशि, शुभ ग्रह से युक्त, द्र्ष्ट हों तो गोचर में शनि, गुरु से संबन्ध बनाने पर अपनी दशा- अन्तर्दशा में विवाह होने का संकेत करता है.

5. सप्तमेश के मित्रों की ग्रह दशा में विवाह (Marriage in the dasha of friendly planets of the seventh lord)
जब किसी व्यक्ति कि विवाह योग्य आयु हों तथा महादशा का स्वामी सप्तमेश का मित्र हों, शुभ ग्रह हों व साथ ही साथ सप्तमेश या शुक्र से सप्तम भाव में स्थित हों, तो इस महाद्शा में व्यक्ति के विवाह होने के योग बनते है.

6. सप्तम व सप्तमेश से दृ्ष्ट ग्रहों की दशा में विवाह (Marriage in the dasha of planets aspected by the seventh house and lord)
सप्तम भाव को क्योकि विवाह का भाव कहा गया है. सप्तमेश इस भाव का स्वामी होता है. इसलिये जो ग्रह बली होकर इन सप्तम भाव , सप्तमेश से दृ्ष्टि संबन्ध बनाते है, उन ग्रहों की दशा अवधि में विवाह की संभावनाएं बनती है

7.  लग्नेश व सप्तमेश की दशा में विवाह (Marriage in the dasha of the ascendant lord or the seventh lord)
लग्नेश की दशा में सप्तमेश की अन्तर्दशा में भी विवाह होने की संभावनाएं बनती है.

8. शुक्र की शुभ स्थिति (Auspicious position of Venus in Marriage astrology)
किसी व्यक्ति की कुण्डली में जब शुक्र शुभ ग्रह की राशि तथा शुभ भाव (केन्द्र, त्रिकोण) में स्थित हों, तो शुक्र का संबन्ध अन्तर्दशा या प्रत्यन्तर दशा से आने पर विवाह हो सकता है. कुण्डली में शुक्र पर जितना कम पाप प्रभाव कम होता है. वैवाहिक जीवन के सुख में उतनी ही अधिक वृ्द्धि होती है

9. शुक्र से युति करने वाले ग्रहों की दशा में विवाह (Marriage in the Dasha of planets in conjunction with Venus)
शुक्र से युति करने वाले सभी ग्रह, सप्तमेश का मित्र, अथवा प्रत्येक वह ग्रह जो बली हों, तथा इनमें से किसी के साथ द्रष्टि संबन्ध बना रहा हों, उन सभी ग्रहों की दशा- अन्तर्दशा में विवाह होने की संभावनाएं बनती है.

10. शुक्र का नक्षत्रपति की दशा में विवाह (Marriage in the dasha of the Nakshatra lord of Venus)
जन्म कुण्डली में शुक्र जिस ग्रह के नक्षत्र में स्थित हों, उस ग्रह की दशा अवधि में विवाह होने की संभावनाएं बनती है.

सिनेमा सितारे और ज्योतिष (Astrology and Film Industry)

1. आवश्यक भाव  (Necessary Houses for Career in Film Industry)
फिल्म एवं टेलिविजन में स्टार कैरियर के लिये व्यक्ति का लग्न व लग्नेश अति बली (The Ascendant or its lord should be strong ) होना चाहिए. जिससे व्यक्ति दूसरों पर अपना प्रभाव छोडने में सक्षम हो सकता है जिससे लोग लम्बे समय तक उसे याद रख सके यह अभिनय के क्षेत्र में काम करने वालों के लिये सबसे आवश्यक गुण है.
कला के क्षेत्र में वो चाहे फिल्मी हो या नाट्य से संबधित हो उसके लिये कुंड्ली का पंचम भाव तथा पंचमेश बलवान होकर दशम व दशमेश से संबध बनाने पर व्यक्ति अभिनय को अपना आजीविका क्षेत्र बनाता है. (The fifth house is thwe house of entertainment in the horoscope)कुण्डली के पंचम घर को मनोरंजन का घर कहा जाता है. यह सिनेमा का भी घर है. व दशम घर को आजीविका का घर कहते है.

तीसरे घर से व्यक्ति के शौक देखे जाते है. इस घर से व्यक्ति में कला या सृ्जनात्मकता का गुण आता है. इसका संबध पंचम या पंचमेश व शुक्र से आये तो व्यक्ति अभिनय में माहिर होता है. इसमें लग्न या लग्नेश से तीसरा घर का संबध बने तो और भी अच्छा समझा जाता है. तीसरा घर मीडिया, संचार के साधनों का घर है इन साधनों के माध्यम से व्यक्ति को लोकप्रियता मिलती है.

2. आवश्यक ग्रह (Necessary Planets for Career in Film Industry)
अभिनय के लिये मन मे इच्छा शक्ति का बली होना आवश्यक है. और इसका कारक चन्द्र है. शुक्र कला से जुडा ग्रह (.(Venus is a planet associated with the artistic acts) है. इन दोनों ग्रहो का संबध पंचम व पंचमेश से होने पर अभिनय के क्षेत्र में जाने का योग बनता है. इसमें बुध वाणी का कारक होकर चन्द्र व शुक्र से संबध बनाये तो व्यक्ति अच्छे डायलाग बोल सकता है.

शुक्र का पीडित होना भी जरुरी है. शुक्र पर पाप प्रभाव न होने पर व्यक्ति अपनी कला का प्रदर्शन करना पसन्द नहीं करता है. उसे अपनी कला का सार्वजनिक प्रदर्शन अपमान जनक लगेगा. तथा व अपनी कला से धन कमाने का प्रयास भी नहीं करेगा. इसलिये इस क्षेत्र से जुडे लोगों की कुण्डलियों में शुक्र पर पाप प्रभाव देखने में आता है.

शुक्र को मूल रुप से आंनद, भोग, ऎश्चर्य, मनोरंजन, व सुन्दरता का ग्रह माना जाता है.  शुक्र का पंचम व पंचमेश से संबध (Relationship of Venus with the fifth house/lord) बनने पर व्यक्ति मनोरंजन के क्षेत्र में सफलता अर्जित करता है.

3. दशायें (Dasha for Career in Film Industry)
व्यक्ति को पांचवे घर, तीसरे घर तथा दशम घर से जुडे ग्रहों की दशा मिलने पर सफलता मिलती है. इस क्षेत्र में काम करने के लिये आयु अधिक महत्व नहीं रखती है. क्योंकि इस में हर आयु के लिये क अलग पात्र की भूमिका होती है. इसमें योग्यता व भाग्य का बली होना आवश्यक होता है.

4. गोचर (Transit for Career in Film Industry)
गोचर का अपना महत्व है. बिना गोचर के दशायें व योग फल नहीं दे पाते है. इसलिये व्यक्ति को उचित ग्रहों का गोचर मिलना उसके सपनों को साकार रुप देने में सहायता करता है.

अन्य योग (Other Yogas for Career in Film Industry)
जन्म लग्न या चन्द्र लग्न या सूर्य लग्न में जो भी बली हो, उससे दशम भाव पर अभिनय कारक शुक्र बली हो व नवाशं कुन्डली में बली ग्रह योग हो तो व्यक्ति को अभिनय, फिल्म, नाटक, माडलिंग आदि मे उच्च स्तर प्राप्त होता है.

स्वग्रही मंगल व गुरु पंचम में हो तथा मनोरंजन कारक शुक्र दूसरे भाव में हो या आपस में संबध रखे ((If Mars is located in its own sign and Jupiter is placed in the fifth house and Venus is placed in the second house) तब भी अभिनय में सफलता मिलती है

राहु द्वारा निर्मित योग और उनका फल (Yoga related with Rahu and thier results)


अष्टलक्ष्मी योग - Ashtalakshmi yoga
वैदिक ज्योतिष में राहु नैसर्गिक पापी ग्रह के रूप में जाना जाता है.इस ग्रह की अपनी कोई राशि नहीं है अत: जिस राशि में होता है उस राशि के स्वामी अथवा भाव के अनुसार फल देता है.राहु जब छठे भाव में स्थित होता है और केन्द्र में गुरू होता है तब यह अष्टलक्ष्मी योग (Ashtalakshmi yoga) नामक शुभ योग का निर्माण करता है.  अष्टलक्ष्मी योग (Ashtalakshmi yoga) में राहु अपना पाप पूर्ण स्वभाव त्यागकर गुरू के समान उत्तम फल देता है. अष्टलक्ष्मी योग (Ashtalakshmi yoga) जिस व्यक्ति की कुण्डली में बनता है वह व्यक्ति ईश्वर के प्रति आस्थावान होता है.इनका व्यक्तित्व शांत होता है.इन्हें यश और मान सम्मान मिलता है.लक्ष्मी देवी की इनपर कृपा रहती है.
लग्न कारक योग - Lagna Karaka Yoga
राहु द्वारा निर्मित शुभ योगों में लग्न कारक योग ( Lagna Karaka Yoga) का नाम भी प्रमुख है. लग्न कारक योग ( Lagna Karaka Yoga)  मेष, वृष एवं कर्क लग्न वालों की कुण्डली में तब बनता है जबकि राहु द्वितीय, नवम अथवा दशम भाव में नहीं होता है.जिस व्यक्ति की कुण्डली में लग्न कारक योग ( Lagna Karaka Yoga) उपस्थित होता है उसे राहु की अशुभता का सामना नहीं करना होता है. राहु इनके लिए शुभ कारक होता है जिससे दुर्घटना की संभावना कम रहती है.स्वास्थ्य उत्तम रहता है.आर्थिक स्थिति अच्छी रहती है एवं सुखी जीवन जीते हैं.
परिभाषा योग (Paribhasha Yoga)
जिस व्यक्ति की कुण्डली में राहु परिभाषा योग (Paribhasha Yoga) का निर्माण करता है.वह व्यक्ति राहु के कोप से मुक्त रहता है.यह योग जन्मपत्री में तब निर्मित होता है जब राहु लग्न में स्थित हो अथवा तृतीय, छठे या एकादश भाव में उपस्थित हो और उस पर शुभ ग्रहों की दृष्टि हो.राहु का परिभाषा योग (Paribhasha Yoga) व्यक्ति को आर्थिक लाभ देता है.स्वास्थ्य को उत्तम बनाये रखता है.इस योग से प्रभावित व्यक्ति के कार्य आसानी से बन जाते हैं.
कपट योग (Kapata Yoga)
दो पापी ग्रह राहु और शनि जब जन्मपत्री में क्रमश: एकादश और षष्टम में उपस्थित होते हैं तो कपट योग (Kapata Yoga) बनता है.जिस व्यक्ति की कुण्डली में कपट योग (Kapata Yoga) निर्मित होता है वह व्यक्ति अपने स्वार्थ हेतु किसी को भी धोखा देने वाला होता है .इनपर विश्वास करने वालों को पश्चाताप करना होता है.सामने भले ही लोग इनका सम्मान करते हों परंतु हुदय में इनके प्रति नीच भाव ही रहता है.
पिशाच योग - Pishach Yoga
पिशाच योग (Pishach Yoga) राहु द्वारा निर्मित योगों में यह नीच योग है.पिशाच योग (Pisach Yoga) जिस व्यक्ति की जन्मपत्री में होता है वह प्रेत बाधा का शिकार आसानी से हो जाता है.इनमें इच्छा शक्ति की कमी रहती है.इनकी मानसिक स्थिति कमज़ोर रहती है, ये आसानी से दूसरों की बातों में आ जाते हैं.इनके मन में निराशात्मक विचारों का आगमन होता रहता है.कभी कभी स्वयं ही अपना नुकसान कर बैठते हैं.
चांडाल योग (Chandal Yoga or Guru Chandal Yoga)
चांडाल योग (Chandal Yoga) गुरू और राहु की युति से निर्मित होता है. चांडाल योग (Chandal Yoga) अशुभ ग्रह के रूप में माना जाता है. चांडाल योग (Chandal Yoga)जिस व्यक्ति की कुण्डली में निर्मित होता है उसे राहु के पाप प्रभाव को भोगना पड़ता है. चांडाल योग (Chandal Yoga) में आर्थिक तंगी का सामना करना पड़ता है.नीच कर्मो के प्रति झुकाव रहता है.मन में ईश्वर के प्रति आस्था का अभाव रहता है.

व्यवसाय एवं नौकरी में उन्नति -प्रमोशन (Your Promotion and astrology)

1. तीन वर्ग कुण्डलियां:  (The three important kundalis - Janm, Navamsh, Dashamsh)
जन्म कुण्डली जीवन की सभी सूचनाओं का चित्र है. मोटी मोटी बातों को जानने के लिये जन्म कुन्डली को देखने से प्रथम दृ्ष्टि मे ही जानकारी हो जाती है. सूक्ष्म अध्ययन के लिये नवांश कुण्डली को देखा जाता है. व्यवसाय मे उन्नति के काल को निकालने के लिये दशमांश कुण्डली की विवेचना भी उतनी ही आवश्यक हो जाती है (The Dashamsh kundali is important in predicting career prospects). इन तीनों कुण्डलियों में दशम भाव दशमेश का सर्वाधिक महत्व है (The tenth lord has a special significance).

तीनों वर्ग कुण्डलियों से जो ग्रह दशम/एकादश भाव या भावेश विशेष संबध बनाते है. उन ग्रहों की दशा, अन्तरदशा में उन्नति मिलने की संभावना रहती है (There is a prospect of raise or promotion in the dasha period of the planets connected with the 10th house). कुण्डलियों में बली ग्रहों की व शुभ प्रभाव के ग्रहों की दशा मे भी प्रमोशन मिल सकता है. एकादश घर को आय की प्राप्ति का घर कहा जाता है. इस घर पर उच्च के ग्रह का गोचर लाभ देता है.

2. पद लग्न से : (Career and Pada Lagna)
पद लग्न वह राशि है जो लग्नेश से ठीक उतनी ही दूरी पर स्थित है. जितनी दूरी पर लग्न से लग्नेश है. पद लग्न के स्वामी की दशा अन्तरदशा या दशमेश/ एकादशेस का पद लग्न पर गोचर करना उन्नति के संयोग बनाता है. पद लग्न से दशम / एकादश भाव पर दशमेश या एकादशेस का गोचर होने पर भी लाभ प्राप्ति की संभावना बनती है.

3. महत्वपूर्ण दशाएं: (Important Dashas)
ऋषि पराशर के अनुसार लग्नेश, दशमेश व उच्च के ग्रहों की दशाएं व्यक्ति को सफलता देती है. इन दशाओं का संबध व्यवसाय के घर या आय के घर से होने से आजीविका में वृ्द्धि होती है. इन दशाओं का संबध यदि सप्तम या सप्तमेश से हो जाये तो सोने पे सुहागे वाला फल समझना चाहिए (Relationship of the dasha lords with the seventh lord is auspicious too).

4. दशमेश नवांश में जिस राशि मे जाये उसके स्वामी से संबन्ध: (The relationship of the tenth-lord with the lord of the sign it is placed in)
जन्म कुण्डली के दशवें घर का स्वामी नवांश कुण्डली में जिस राशि में जाये उसके स्वामी के अनुसार व्यक्ति का व्यवसाय व उसपर बली ग्रह की दशा/ गोचर उन्नति के मार्ग खोलता है. इन ग्रहों की दशा में व्यक्ति को अपनी मेहनत में कमी न करते हुए अधिक से अधिक लाभ प्राप्त करने का प्रयास करना चाहिए. उन्नति के समय में आलस्य व्यक्ति को मिलने वाले शुभ फलों में कमी का कारण बन सकता है.

5. गोचर: (Planetary transits and career)
उपरोक्त चार नियमों का अपना विशेष महत्व है. लेकिन इच्छित फल पाने के लिये गोचर का सहयोग भी लेना आवश्यक है (One most consider the planetary transits to judge raise). कुण्डली में उन्नति के योग हो, पद लग्न पर शुभ प्रभाव हो, दशवे घर व ग्यारहवें घर से जुड़ी दशाएं हो व गुरु शनि का गोचर हो तो व्यक्ति को मिलने वाली उन्नति को कोई नहीं रोक सकता है.

12.12.1951 ,जन्म समय ,9.11 बजे जन्म स्थान दिल्ली. यह व्यक्ति पेशे से आर्किटेक्ट है. 

जिन्हें गुरु की महादशा में बुध की अन्तर्दशा के बीच यानि अक्तूबर 1989 से फरवरी 1992 तक के दौरान 1989 में बहुत बडी कम्पनी मे कम्पनी की मिलों को बनाने का काम मिला. इसके बाद व्यक्ति सफलता के पायदान पर चढ़ता गया. उन्हे जीवन में पीछे मुडके देखने की जरुरत नहीं महसूस हुई.

इस व्यक्ति की कुण्डली में लग्न/लग्नेश, व दशम/ दशमेश की स्थिति बहुत अच्छी है. बुध दशमेश को पंचमेश/ द्वादशेश तथा दिगबली मंगल की दृ्ष्टि है. लग्नेश स्वग्रही है. शनि दशम घर में अमात्यकारक होकर स्थित है. शनि मंगल दोनो के दशम घर में होने से पराक्रम व मेहनत, लगन सभी एक साथ व्यक्ति में आ रहा है.

नवांश में दशमेश बुध मंगल के साथ सप्तम घर में स्थित है. जिनपर लग्नेश गुरु की दृ्ष्टि है. दशमांश कुण्डली में दशमेश शुक्र पर मंगल व शनि दोनो की दृष्टि होने से फल अच्छा मिल रहा है.  व्यक्ति के जीवन मे व्यावसायिक उन्नति की संभावना बहुत अच्छी है.

पद लग्न मिथुन राशि में स्थित है. जिसे पद लग्न का स्वामी बुध देखकर बल प्रदान कर रहा है. पद लग्न को शनि भी देख रहा है जिससे पद लग्न के शुभ फलों में इज़ाफा हो रहा है.

गुरु/ बुध की दशाओं में व्यक्ति को उन्नति मिली. गुरु/ बुध का सम्बन्ध आय व व्यवसाय से सभी जगह आ रहा है. गुरु बुध मे से एक लग्नेश है तो दूसरा दशमेश है. दोनों बलवान होकर स्थित है. इससे इन दोनो ग्रहों के फल विशेष रुप से मिलने की संभावना है. दोनों का दृष्टि संबध राजयोग भी बना रहा है.

गोचर को देखे तो दिसम्बर 1989 में दोनों ग्रह गुरु/ बुध मिथुन व धनु मे गोचर कर रहे थे. अर्थात दोनों ही एक दूसरे की राशियों में गोचर कर रहे थे.

राजनीति में प्रवेश एवं सफलता के लिये ज्योतिष योग (Astrology Yoga for Carrer in Politics)

1. आवश्यक भाव : छठा, सांतवा, दसवां व ग्यारहवां घर (Important Houses for Carrer in Politics) 
सफल राजनेताओं की कुण्डली में राहु का संबध छठे, सांतवें, दशवें व ग्यारहवें घर से देखा गया है. कुण्डली के दशवें घर को राजनीति का घर कहते है. सत्ता में भाग लेने के लिये दशमेश या दशम भाव में उच्च का ग्रह बैठा होना चाहिए.

और गुरु नवम में शुभ प्रभाव में स्थिति होने चाहिए. या दशम घर या दशमेश का संबध सप्तम घर से होने पर व्यक्ति राजनीति में सफलता प्राप्त करता है. छठे घर को सेवा का घर कहते है. व्यक्ति में सेवा भाव होने के लिये इस घर से दशम /दशमेश का संबध होना चाहिए.  सांतवा घर दशम से दशम है इसलिये इसे विशेष रुप से देखा जाता है.

2. आवश्यक ग्रह: राहु, शनि, सूर्य व मंगल . (Important Houses: Rahu, Saturn, Sun and Mars) 
राहु को सभी ग्रहों में नीति कारक ग्रह का दर्जा दिया गया है. इसका प्रभाव राजनीति के घर से होना चाहिए. सूर्य को भी राज्य कारक ग्रह की उपाधि दी गई है. सूर्य का दशम घर में स्वराशि या उच्च राशि में होकर स्थित हो व राहु का छठे घर, दसवें घर व ग्यारहवें घर से संबध बने तो यह राजनीति में सफलता दिलाने की संभावना बनाता है. इस योग में दूसरे घर के स्वामी का प्रभाव भी आने से व्यक्ति अच्छा वक्ता बनता है.

शनि दशम भाव में हो या दशमेश से संबध बनाये और इसी दसवें घर में मंगल भी स्थिति हो तो व्यक्ति समाज के  लोगों के हितों के लिये काम करने के लिये राजनीति में आता है. यहां शनि जनता के हितैशी है तथा मंगल व्यक्ति में नेतृ्त्व का गुण दे रहा है. दोनों का संबध व्यक्ति को राजनेता बनने के गुण दे रहा है.

3. अमात्यकारक : राहु/ सूर्य (Amatyakarak Rahu and Sun)
राहु या सूर्य के अमात्यकारक बनने से व्यक्ति रुचि होने पर राजनीति के क्षेत्र में सफलता पाने की संभावना रखता है. राहु के प्रभाव से व्यक्ति नीतियों का निर्माण करना व उन्हें लागू करने की ण्योग्यता रखता है. राहु के प्रभाव से ही व्यक्ति में स्थिति के अनुसार बात करने की योग्यता आती है. सूर्य अमात्यकारक होकर व्यक्ति को समाज में उच्च पद की प्राप्ति का संकेत देता है. नौ ग्रहों में सूर्य को राजा का स्थान दिया गया है.

4. नवाशं व दशमाशं कुण्डली (Navamsha and Dashamasha Kundli)
जन्म कुण्डली के योगों को नवाशं कुण्डली में देख निर्णय की पुष्टि की जाती है. किसी प्रकार का कोई संदेह न रहे इसके लिये जन्म कुण्डली के ग्रह प्रभाव समान या अधिक अच्छे रुप में बनने से इस क्षेत्र में दीर्घावधि की सफलता मिलती है. दशमाशं कुण्डली को सूक्ष्म अध्ययन के लिये देखा जाता है. तीनों में समान या अच्छे योग व्यक्ति को राजनीति की उंचाईयों पर लेकर जाते है.

5. अन्य योग  (Other planets combination)
(1)  नेतृ्त्व के लिये व्यक्ति का लग्न सिंह अच्छा समझा जाता है. सूर्य, चन्द्र, बुध व गुरु धन भाव में हों व छठे भाव में मंगल, ग्यारहवे घर में शनि, बारहवें घर में राहु व छठे घर में केतु हो तो एसे व्यक्ति को राजनीति विरासत में मिलती है. यह योग व्यक्ति को लम्बे समय तक शासन में रखता है. जिसके दौरान उसे लोकप्रियता व वैभव की प्राप्ति होती है.

(ख) कर्क लग्न की कुण्डली में दशमेश मंगल दूसरे भाव में , शनि लग्न में, छठे भाव में राहु, तथा लग्नेश की दृष्टि के साथ ही सूर्य-बुध पंचम या ग्यारहवें घर में हो तो व्यक्ति को यश की प्राप्ति होती.

(ग) वृ्श्चिक लग्न की कुण्डली में लग्नेश बारहवे में गुरु से दृ्ष्ट हो शनि लाभ भाव में हो, राहु -चन्द्र चौथे घर में हो, शुक्र स्वराहि के सप्तम में लग्नेश से दृ्ष्ट हो तथा सूर्य ग्यारहवे घर के स्वामी के साथ युति कर शुभ स्थान में हो और साथ ही गुरु की दशम व दूसरे घर पर दृ्ष्टि हो तो व्यक्ति प्रखर व तेज नेता बनता है. 

साफ्टवेयर प्रोग्रामर कैरियर के लिये ज्योतिष योग (Astrology Yoga for Software Programmer Carrer)

1. आवश्यक भाव: पंचम भाव / पंचमेश व दशम / दशमेश  (Important Houses: The Fifth House/lord or The Tenth House/lord)
कुण्डली के पांचवे घर को शिक्षा का घर कहते है.तकनिकी क्षेत्र में योग्यता अर्जित करने के लिये व्यक्ति की कुण्डली में शिक्षा का सीधा संबध दशम से होना चाहिए. अर्थात पंचम घर / पंचमेश से दशम व दशमेश का संबध होना चाहिए. इसके अलावा यह योग डाक्टरों की कुण्डली में भी मुख्य रुप से देखा जाता है.  डाक्टरों की कुण्डली में इसमें अस्पताल का भाव भी जुड जाता है. जिससे दोनों को अलग किया जा सकता है.

2. आवश्यक ग्रह (Important Planets for Software Programmer Carrer)
मंगल व शनि दोनों का प्रभाव इंजिनियरों की कुण्डली में होता है. इसके अतिरिक्त राहु/ केतु को भी इसमें सम्मिलित किया जाता है. पांचवे घर के साथ साथ, चौथे घर को भी शिक्षा का घर कहा जाता है. इन दोनों ग्रहों पर मंगल, शनि, राहु, केतु का सीधा प्रभाव व्यक्ति को इंजिनियर बनाता है.

3. अमात्यकारक ग्रह (3. Amatyakarak grahas for Software Programmer Carrer)
जैमिनी पद्वति (Gemini Astrology) के अमात्यकारक का प्रयोग करने से आजिविका के क्षेत्र की विशिष्टता का सरलता से ज्ञान किया जा सकता है. इस योग में अमात्यकारक ग्रह जिस ग्रह से अधिक संबध बनाता है उसी ग्रह के कारकतत्वों के अनुसार उसे क्षेत्र मिलता है.

4. दशाएं  (Graha Direction for Software Programmer Carrer)
इंजिनियरिंग का व्यवसाय प्रारम्भ करने की दशा ,दशमेश /दशम भाव में बैठे ग्रहों अथवा दशमेश के नक्षत्र स्वामी की होने पर आय प्राप्ति में सफलता मिलती है. बिना उचित दशाओं के सफलता की उंचाईयों को नहीं छुआ जा सकता है.
दशाएं तरक्की का समय निर्धारित करती है. तथा गोचर से फल मिलने आरम्भ होते है.:

5. अन्य योग (Other Yogas for Software Programmer Carrer)
(क)  आईटी में जाने के लिए आवश्यक शिक्षा उच्च स्तर की होनी चाहिए. अगर कुण्डली में दूसरे, चौथे व पांचवे घर का नवम, लग्न व दशम घर से संबध होने के साथ साथ गुरु, मंगल, शनि, बुध, शनि व शुक्र का आपस में संबध बने तो व्यक्ति को उच्च शिक्षा प्राप्त करने के अवसर मिलते है.

(ख)  अगर पंचम घर में शुभ ग्रह की राशि, प़ंचमेश की युति हो या शिक्षा के कारक गुरु, बुध, मंगल के साथ युति या दृ्ष्टि संबध बने व शुक्र व शनि दोनो यन्त्रों से जुडे ग्रह होकर शिक्षा भाव से संबध बनाये तो व्यक्ति इस क्षेत्र में शिक्षा प्राप्त कर आई.टी क्षेत्र में  सफलता प्राप्त करता है.

(ग) कुण्डली में गुरु व बुध का एक साथ बैठना या शुक्र व मंगल, गुरु व बुध के साथ किसी शुभ घर में हों. शनि भी राहु से युति या दृ्ष्टि संबध बनाये तो व्यक्ति को आई. टी. मे उच्च शिक्षा प्राप्त करने में सफल होता है.

(घ)  गुरु-चन्द्र का गजकेसरी योग (Gaj Kesari Yoga) केन्द्र या त्रकोण में बने, नवमेश और धनेश होकर मंगल पांचवे घर में हो. सूर्य के साथ शुक्र और बुध गुरु की राशि में हो तथा केतु जिसे बारिक यन्त्रों का कारक कहा गया है. गुरु की राशि में स्थित होकर केन्द्र में हो व्यक्ति अतिउतम शिक्षा प्राप्त करता है.

(ड)  मीन लग्न में पंचमेश, नवमेश व मंगल के साथ लग्न में स्थित हों तथा केन्द्रों में शनि, सूर्य व बुध हो, तथा गुरु, शुक्र तीसरे व नवम भाव में बैठे तो व्यक्ति को आई. आई. टी. जैसे उच्च शिक्षा संस्थान से शिक्षा पाने में सफल होता है. 

कैरियर और कारकांश कुण्डली (Career & Karakamsh Kundali)

आजीविका और कैरियर के विषय में दशम भाव को देखा जाता है (Tenth Bhava is for Career).दशम भाव अगर खाली है तब दशमेश जिस ग्रह के नवांश में होता है उस ग्रह के अनुसार आजीविका का विचार किया जाता है.द्वितीय एवं एकादश भाव में ग्रह अगर मजबूत स्थिति में हो तो वह भी आजीविका में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं.ज्योतिषशास्त्र के नियमानुसार व्यक्ति की कुण्डली में दशमांश शुभ स्थान पर मजबूत स्थिति में होता है (Strongly placed tenth lord) तो यह आजीविका के क्षेत्र में उत्तम संभावनाओं का दर्शाता है.दशमांश अगर षष्टम, अष्टम द्वादश भाव में हो अथवा कमज़ोर हो तो यह रोजी रोजगार के संदर्भ में कठिनाई पैदा करता है.

जैमिनी पद्धति के अनुसार व्यक्ति के कारकांश कुण्डली में लग्न स्थान में सूर्य या शुक्र होता है तो व्यक्ति राजकीय पक्ष से सम्बन्धित कारोबार करता है अथवा सरकारी विभाग में नौकरी करता है.कारकांश में चन्द्रमा लग्न स्थान में हो (Moon in Ascendant in Karakamsh Kundali) और शुक्र उसे देखता हो तो इस स्थिति में अध्यापन के कार्य में सफलता और कामयाबी मिलती है.कारकांश में चन्द्रमा लग्न में होता है और बुध उसे देखता है तो यह चिकित्सा के क्षेत्र में कैरियर की बेहतर संभावनाओं को दर्शाता है.कारकांश में मंगल के लग्न स्थान पर होने से व्यक्ति अस्त्र, शस्त्र, रसायन एवं रक्षा विभाग से जुड़कर सफलता की ऊँचाईयों को छूता है.
कारकांश लग्न में जिस व्यक्ति के बुध होता (Mercury in Ascendant of Karakamsh Kundali) है वह कला अथवा व्यापार को अपनी आजीविका का माध्यम बनता है तो आसानी से सफलता की ओर बढ़ता है.कारकांश में लग्न स्थान पर अगर शनि या केतु है तो इसे सफल व्यापारी होने का संकेत समझना चाहिए.सूर्य और राहु के लग्न में होने पर व्यक्ति रसायनशास्त्री अथवा चिकित्सक हो सकता है.

ज्योतिष विधान के अनुसार कारकांश से तीसरे, छठे भाव में अगर पाप ग्रह स्थित हैं या उनकी दृष्टि है तो इस स्थिति में कृषि और कृषि सम्बन्धी कारोबार में आजीविका का संकेत मानना चाहिए.कारकांश कुण्डली में चौथे स्थान पर केतु (Ketu in fourth house of Karakamsh Kundali) व्यक्ति मशीनरी का काम में सफल होता है.राहु इस स्थान पर होने से लोहे से कारोबार में कामयाबी मिलती है.कारकांश कुण्डली में चन्द्रमा अगर लग्न स्थान से पंचम स्थान पर होता है और गुरू एवं शुक्र से दृष्ट या युत होता है तो यह लेखन एवं कला के क्षेत्र में उत्तमता दिलाता है.
कारकांश में लग्न से पंचम स्थान पर मंगल (Mars in fifth house of Karakamsh Kundali) होने से व्यक्ति को कोर्ट कचहरी से समबन्धित मामलों कामयाबी मिलती है.कारकांश कुण्डली के सप्तम भाव में स्थित होने से व्यक्ति शिल्पकला में महारत हासिल करता है और इसे अपनी आजीविका बनाता है तो कामयाब भी होता है.करकांश में लग्न से पंचम स्थान पर केतु व्यक्ति को गणित का ज्ञाता बनाता है.

फैशन विशेषज्ञ और ज्योतिष योग (Astrology Yoga for Fashion Designer Career)

फैशन डिजाइंनिंग के व्यवसाय से जुडने के लिये व्यक्ति में कलात्मक अभिरुचि और उसको करने का जुझारुपन होना चाहिए तथा भाग्य का सहयोग भी व्यक्ति को मिले तो सफलता व्यक्ति के कदम चूमंती है.

फैशन डिजायन का व्यवसाय तेजी से निरन्तर फैलता जा रहा है. शहर के युवाओं के लिये यह सबसे पसन्दीदा काम है. क्योंकि फ़ैशन डिजायन कैरियर में काम व दाम दोनों है. साथ ही ग्लैमर तो है ही. फैशन विशेषज्ञ के क्षेत्र में कई भिन्नताएं है. कुछ को इसमें वस्त्र, आभूषण श्रंगार अथवा कपडो की कटाई, सिलाई आदि का काम पसन्द आता है. तो कुछ व्यक्तियों को फैशन शो का आयोजन करना अधिक पसन्द होता है. इस प्रकार देखे तो फैशन का क्षेत्र अत्यन्त विस्तृत है. यह सही है कि फैशन की दुनिया में व्यक्ति को सबसे अलग सोच को साकार करने का मौका मिलता है. आइये इसे फैशन डिजायन कैरियर के लिये ज्योतिष योगों  (Astrology Yoga for Fashion Designer Career) को देखें

आवश्यक भाव :- तीसरा, नवम व बारहवां घर (Prime houses - third, ninth and twelfth)

फैशन के भावों में तीसरा घर, नवम घर व द्वादश घर को मुख्य घर समझा जाता है. द्वादश का घर इसमें इसलिए सम्मिलित किया जाता है क्योकि इस घर का प्रभाव मिलने से व्यक्ति अपनी प्रतिभा को विदेश में जाकर प्रदर्शित कर सकता है. तीसरे घर को प्रतिभा का घर कहा जाता है. नवम घर से विशेष शिक्षा देखते है.

व द्वादश घर क्योकि यह तीसरे से दशवां घर (12th is the tenth house from 3rd) है इसलिये इसका महत्व ओर भी बढ जाता है. अत: जरुरी घर तीन हुए वह है तीसरा, नवम व बारहवां. इन सभी का दसंवे घर से संबध व्यक्ति को इस क्षेत्र में ले आता है.

2. आवश्यक ग्रह:- शुक्र, राहु व चन्द्रमा. (Prime planets: Venus, Rahu and Moon)
श्रंगार व सजावट का कारक शुक्र है (Venus is the karak for beauty and decoration). शुक्र के नये-नये प्रयोग, नयी कृ्तियों को सामने लाने का कार्य मन के कारक चन्द्र द्वारा संभव होता है. अत: शुक्र को चन्द्र का सहयोग मिले तो क्या कहना.  राहु है परम्परा से हटकर काम कराना, अनजानी राहों पर चलना इन्हे बेहद पसन्द आता है. नये विचारों को खोजना, लीक से हटकर कुछ नया करना  यह सब राहु की कृपा से ही होता है. शुक्र, राहु के मित्र भी है अत: ग्रह हुए शुक्र, राहु व चन्द्रमा.

 3. मंगल, शनि का दूसरे व दंसवे घर के भाव/भावेशो से संबध (The relationship between Mars, Saturn and houses 2nd, 10th)
फैशन की दुनिया में स्थान बनाने के लिये व्यक्ति की कुण्डली में मंगल व शनि जिन्हे तकनीकि ग्रह कहा जाता है इनका संबध दूसरे घर व दंसवे घर से पाया जाता है (There should be a relationship between Mars and Saturn). इससे व्यक्ति इस क्षेत्र में व्यक्ति की कर्मठता बढती है. क्योकी यह ऎसा व्यवसाय है जिसमें अपने काम की सराहना स्वयं ही करनी पडती है. तथा अपने प्रतिभा का प्रचार अपने आप ही करना पडता है. इस क्षेत्र में अपने आत्मविश्वास को सदा उच्च रखना पडता है.

4. फैशन के क्षेत्र में अमात्यकारक की भूमिका (The Amatyakarak and Fashion Designer Career): 
जैमिनी ज्योतिष के अमात्यकारक (Amatyakarak in Jaimini astrology) से व्यक्ति के व्यवसाय की दिशा जानना बेहद सरल है. कुण्डली में जब शुक्र का सम्बन्ध अमात्यकारक से बने व अमात्यकारक का संबध चन्द्रमा और राहु से हो तो व्यक्ति फैशन के क्षेत्र में किस्मत आजमाता है. इन सब ग्रहों का संबध तीसरे, नवम, व बारहवें भावों से होना चाहिए. जैमिनी ज्योतिष में अमात्यकारक वह ग्रह होता है जो कुण्डली में सबसे अधिक अंशों वाले ग्रह के बाद अधिक अंशों पर हो.

5. दशायें (Planetary periods )
ज्योतिष के योग होने से ही व्यक्ति को सफलता नहीं मिलती है. इसके लिये व्यक्ति को संबन्धित ग्रहों की दशाये भी मिलनी चाहिए. आय अर्जन के समय पर दसवें ग्रह, एकादश भावों के स्वामियों की दशा मिले तो व्यक्ति को योगों के पूरे फल मिलने की संभावना रहती है.

व्यक्ति की दशाएं अगर व्यवसाय के क्षेत्र से भावों की हों तो व्यक्ति को सफलता पाने में सरलता रहती है. जैसे:  उपरोक्त ग्रह योग हों और व्यक्ति को तीसरे, नवम, व बारहवें घर से जुडे ग्रहों की दशायें व्यक्ति की उचित समय में उचित दशाये मिले तो व्यक्ति सफलता की उंचाईयां चढता है.

6. गोचर (Planetary Transits):
कुण्डली में गोचर की भूमिका को नजर अन्दाज नहीं किया जा सकता है. गोचर कुण्डली (Transit Kundali) के ग्रहों के योगों को व्यक्ति की झोली में डालता है. साधारण शब्दों में इसके काम को डाकिये के काम के समान समझा जा सकता है. उदाहरण के लिये कुण्डली के दसमेश पर गोचर के दसमेश से दृ्ष्टि संबन्ध व्यक्ति को पेशे में विशेष रुप से सफलता दिलाने में सहायक रहेगा.

7. अन्य योग (Other Yogas): 
(क) व्यक्ति की कुण्डली में शुक्र का संबध चेहरे के घर दुसरे घर से हो (If Venus has an influence on the second house) तो व्यक्ति मुख व बालों को सजाने से जुडा काम करना पसन्द करता है. इसी प्रकार शुक्र का संबंध भवन के कारक मंगल अथवा निवास स्थान के घर जिसे चौथे घर के नाम से जाना जाता है. से संबध हो तो व्यक्ति को भवन को सजाने संवारने में रुचि होने की संभावनाएं बनती है.

(ख) व्यक्ति के लग्न में शुक्र, चतुर्थ में मंगल तथा दशम में शनि होने पर व्यक्ति का इंटीरियर डेकोरेटर के पेशे की ओर झुकाव रहता है. इसके अलावा व्यक्ति की लग्न शुक्र की राशि हो, चंन्दमा  दशंवे घर में स्थित होकर शुक्र से संबध बनाये. तो व्यक्ति फैशन डिजाइनिंग के क्षेत्र से आय की प्राप्ति करता है. 

जैमिनी ज्योतिष से व्यवसायिक स्थिति (Analysing Business From Jaimini Astrology)


आपके लिए व्यवसाय में कैसी स्थिति रहेगी इस विषय का आंकलन आप चाहें तो जैमिनी (Jaimini astrology) महोदय के बताये विधि से ज्ञात कर सकते हैं.जैमिनी महोदय की विधि अमात्यकारक (Amatya Karak) पर निर्भर करती है.इस विधि में आपको अपनी कुण्डली में अमात्यकारक की स्थिति को देखना होता है.आमात्यकारक कुण्डली में लग्न से किस स्थिति यानी किस भाव में बैठा है.अमात्यकारक पर किस किस ग्रह की दृष्टि (Aspect on Amatyakarak) पड़ रही है.अमात्यकारक से ग्रहों की किस प्रकार की युति है (Planetary Conjunction With AmatyaKarak). इन सभी तथ्यों के आधार पर कारोबार में सफलता असफलता एवं लाभ हानि को ज्ञात किया जा सकता है.

जैमिनी ज्योतिष  (Jaimini astrology)  के अनुसार आपकी कुण्डली में अमात्यकारक लग्न से केन्द्र, त्रिकोण (Trine Houses) अथवा एकादश भाव में स्थित है तो आपके लिए व्यवसाय में उत्तम स्थिति का संकेत समझना चाहिए.इस स्थिति में अगर आप व्यवसाय करते हैं तो आप व्यवसाय में निरन्तर आगे बढ़ते जाएंगे और कामयाबी की राह में बिना किसी बाधा या परेशानी के कामयाबी के पायदान पर चढ़ते जाएंगे.ग्रह की दृष्टि के विषय में यह नियम है कि अमात्यकारक पर जिस ग्रह की दृष्टि होगी उस ग्रह के स्वभाव और गुण के अनुसार फल प्राप्त होता है.अमात्यकारक पर अगर शुभ ग्रहों की दृष्टि है तो व्यापार के लिए शुभ संकेत समझना चाहिए और अगर अशुभ ग्रहों की दृष्टि है तो व्यापार में असफलता और रूकावट का संकेत समझना चाहिए.इसी प्रकार अमात्यकारक के साथ ग्रहों की शुभ युति में व्यापार सफल होता है और कामयाबी मिलती है जबकि अशुभ ग्रहों की युति होने पर व्यापार में सफलता नहीं मिल पाती है।

अगर आपकी कुण्डली में अमात्यकारक अशुभ ग्रह है (Malefic Amatyakarak) और उस पर अशुभ ग्रहों की दृष्टि है साथ ही अगर वह अशुभ स्थान पर विराजमान है तो व्यवसाय में सफलता और असफलता का क्रम चलता रहता है.जन्मपत्री में अमात्यकारक शुभ ग्रह हो और इनपर शुभ ग्रहों की दृष्टि हो तथा यह शुभ स्थान पर विराजमान हों तो ऐसी स्थिति में आपको व्यापार में सदैव सफलता मिलती है और आप कामयाब व्यापारी होते हैं.यह तथ्य स्मरणीय है कि अमात्यकारक षष्ठेश से सम्बन्ध रखता है (Amatyakarak has a relation with the sixth-lord) और अष्टमेश से सम्बन्ध नहीं रखता है तो व्यापार में सफलता मिलने की संभावना रहती है परंतु इसके लिए संघर्षशील और परिश्रमी होना पड़ता है.

इस प्रकार आप अपनी कुण्डली में अमात्यकारक की स्थिति को देखकर व्यापार में अपनी स्थिति का आंकलन कर सकते हैं.

प्रशासनिक अधिकारी बनने के लिये ज्योतिष योग (Astrology Yoga for Administrative Officer Carrer)


1. उच्च शिक्षा के योग  (Astrology Yoga for Higher Studies)
आई. ए. एस. जैसे उच्च पद की प्राप्ति के लिये व्यक्ति की कुण्डली में शिक्षा का स्तर अच्छा होना चाहिए. शिक्षा के लिये शिक्षा के भाव  दूसरा, चतुर्थ भाव, पंचम भाव व नवम भाव को देखा जाता है. इन भाव/भावेशों के बली होने पर व्यक्ति की शिक्षा उतम मानी जाती है. शिक्षा से जुडे ग्रह है बुध, गुरु व मंगल इसके अतिरिक्त  शिक्षा को विशिष्ट बनाने वाले योग भी व्यक्ति की सफलता का मार्ग खोलते है. शिक्षा के अच्छे होने से व्यक्ति नौकरी की परीक्षा में बैठने के लिये योग्यता आती है.

2. आवश्यक भाव: छठा, पहला व दशम घर  (Importance of Bhava - 1st, 6th and 10th house)
किसी भी प्रतिस्पर्धात्मक परीक्षा में सफलता के लिये लग्न, षष्टम, तथा दशम भावो/ भावेशों का शक्तिशाली होना तथा इनमे पारस्परिक संबन्ध होना आवश्यक है. ये भाव/ भावेश जितने समर्थ होगें और उनमें पारस्परिक सम्बन्ध जितने गहरे होगें उतनी ही उंचाई तक व्यक्ति अपनी नौकरी में जा सकेगा.

इसके अतिरिक्त सफलता के लिये पूरी तौर से समर्पण तथा एकाग्र मेहनत की आवश्यकता होती है. इन सब गुणौ का बोध तीसरा घर कराता है. जिससे पराक्रम के घर के नाम से जाना जाता है. तीसरा भाव इसलिये भी बहुत महत्वपूर्ण है क्योकी यह दशम घर से छठा घर है. इस घर से व्यवसाय के शत्रु देखे जाते है.

इसके बली होने से व्यक्ति में व्यवसाय के शत्रुओं से लडने की क्षमता आती है. यह घर उर्जा देता है. जिससे सफलता की उंचाईयों को छूना संभव हो पाता है.

3. आवश्यक ग्रह (Graha in your Horoscope)
कुण्डली के सभी ग्रहों में सूर्य को राजा की उपाधि दी गई है. तथा गुरु को ज्ञान का कारक कहा गया है. ये दो ग्रह मुख्य रुप से प्रशासनिक प्रतियोगिताओं में सफलता और उच्च पद प्राप्ति मे सहायक ग्रह माना जाता है. एसे अधिकारियों के लिये जिनका कार्य मुख्य रुप से जनता की सेवा करना है.

उनके लिये शनि का महत्व अधिक हो जाता है. क्योकि शनि जनता व प्रशासनिक अधिकारियों के बीच के सेतू है. कई प्रशासनिक अधिकारी नौकरी करते समय भी लेखन को अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाने में सफल हुए है. यह मंगल व बुध की कृपा के बिना संभव नहीं है. मंगल को स्याही व बुध को कलम कहा जाता है.

प्रशासनिक अधिकारी मे चयन के लिये सूर्य, गुरु, मंगल, राहु व चन्द्र आदि ग्रह बलिष्ठ (Guru, Surya, Mangal, Rahu and Chandra should be powerful)  होने चाहिए. मंगल से व्यक्ति में साहस, पराक्रम व जोश आता है. जो प्रतियोगीताओं में सफलता की प्राप्ति के लिये अत्यन्त आवश्यक है.

4. अमात्यकारक ग्रह की भूमिका (Role of Amatyakarak Graha)
प्रशासनिक अधिकारी के पद की प्राप्ति के लिये अमात्यकारक ग्रह बडी भूमिका निभाता है. अगर किसी कुण्डली में अमात्यकारक बली है. (स्वग्रही, उच्च के, वर्गोतम) आदि स्थिति में हों. तथा केन्द्र में है. इसके अतिरिक्त बलशाली अमात्यकारक (Powerful Amatyakarak Graha) तीसरे व एकादश घरों में होने पर व्यक्ति को अपने जीवन काल में काफी उंचाई तक जाने का मौका मिलता है.

इस स्थिति में व्यक्ति को एसे काम करने के अवसर मिलते है. जिनमें वह आनन्द का अनुभव कर पाता है. अमात्यकारक नवाशं में आत्मकारक से केन्द्र अथवा तीसरे या एकादश भाव में हो तो व्यक्ति को सुन्दर व बाधा रहित नौकरी मिलती है. इसलिये अमात्यकारक की नवाशं में स्थिति भी देखी जाती है.

5. दशायें (Dashas)
व्यक्ति की कुण्डली में नौकरी में सफलता मिलने की संभावनाएं अधिक है. और दशा भी उन्ही ग्रहों से संबन्धित मिल जाये तो सफलता अवश्य मिलती है. व्यक्ति को आई.ए.एस. बनने के लिये दशम, छठे, तीसरे व लग्न भाव/भावेशों की दशा मिलनी अच्छी होगी.

6 अन्य योग (Other astrology Yoga)
क) भाव एकादश का स्वामी नवम घर में हो या दशम भाव के स्वामी से युति या दृ्ष्ट हो तो व्यक्ति के प्रशासनिक अधिकारी बनने की संभावना बनती है.

ख) पंचम भाव में उच्च का गुरु या शुक्र होने पर उसपर शुभ ग्रहों का प्रभाव हो तथा सूर्य भी अच्छी स्थिति में हो तो व्यक्ति इन्ही ग्रहों की दशाओं में उच्च प्रशासनिक अधिकारी बनता है.

ग) लग्नेश और दशमेश स्वग्रही या उच्च के होकर केन्द्र या त्रिकोण में हो और गुरु उच्च का या स्वग्रही हो तो भी व्यक्ति की प्रशासनिक अधिकारी बनने की प्रबल संभावना होती है.

घ) कुण्डली के केन्द्र में विशेषकर लग्न में सूर्य, और बुध हों और गुरु की शुभ दृ्ष्टि इन पर हो तो जातक प्रशासनिक सेवा में उच्च पद प्राप्त करने में सफल रहता है

पंच-पक्षी ज्योतिष पद्वति (Pancha-Pakshi Shastra Astrology System)

पंच- पक्षी (Panch-pakshi Shastram)  के नाम से जानी जाने वाली इस विधि में  पंच का अर्थ पांच से है. व पक्षी जिन्हे परिन्दों के नाम से भी जाना जाता है. इस पद्वति के पांच पक्षी :- गिद्ध, उल्लू, कौआ, मुर्गा, व मोर है (The panch-pakshi are Vulture, Owl, Crow, Rooster and Peacock).

ये सभी पांच पक्षी प्रतिदिन पांच प्रकार की क्रियाओं को करने में लगे रहते है. वो पांचों क्रियाएं क्रम से इस प्रकार है.

    * 1 खाना
    * 2 चलना
    * 3 राज करना
    * 4 सोना
    * 5 मरना


व्यक्ति का जन्म पक्षी जन्म नक्षत्र सख्या व चन्द्र के शुक्ल/कृ्ष्ण पक्ष (Birth Pakshi  or Nakshatra Pakshi) से निर्धारित होता है. यह पूरे जीवन के लिये स्थिर होता है. पंच पक्षी विधि (Panch Pakshi Astrology System)  अनेक प्रकार से उपयोगी पाई गई है. पंच-पक्षी से व्यक्ति पूरे दिन में अलग अलग समय में निश्चित काम करके सफलता प्राप्त कर सकता है. इस विधि में समय दशा निकालना बहुत सरल है.

यात्रा के दौरान मिलने वाले अनुभवों को जन्म पक्षी किस प्रकार प्रभावित करता है. तथा दिन के किस में समय यात्रा करना लाभदायक रहेगा, आईए देखे:-

1. जन्म पक्षी के खाना खाने की क्रिया के दौरान यात्रा करना: (Journey while the Pakshi is in eating state)
जो व्यक्ति जन्म पक्षी के खाना खाने की क्रिया के समय में यात्रा करता है उसे मार्ग में रोगग्रस्त होने की संभावना नहीं रहती है. उसे यात्रा के दौरान नये- नये लोगों से मिलने का अवसर मिलता है. वह अपने यात्रा के ल़क्ष्य को पाने में सफल होता है. अर्थात उसका यात्रा करना लाभदायक रहता है. इस समय में यात्रा करने से संचित धन में भी बढोतरी होने की संभावना रहती है. व व्यक्ति को किसी प्रकार की मानसिक परेशानी भी नहीं होगी.

(क) जन्म पक्षी खाना खाने की क्रिया में तथा क्रियामान पक्षी राज करने के अलावा अन्य क्रियाओं में व्यस्त होना चाहिए तथा उसके जन्म पक्षी से शत्रु संबध होने पर :- यात्रा से मिलने वाले फल विपरीत होगे. अर्थात

इस से आपको यात्रा से निराशा हाथ आने की संभावना है. रास्ते में भी आपको अनेक परेशानियों का सामना करना पडेगा. यह भी संभव है की मार्ग में आपको उचित खाना भी न मिले.  इस बात की भी संभावना बन रही है की आपको रास्ते में अपने साथ के मित्रों व रिश्तेदारों से किसी बात  लेकर झगडना भी पडे. अर्थात संबध खराब होने की संभावना भी है.

उस समय आप को यात्रा करना असुविधाजनक  लगेगा. यह आपकी अप्रसन्नता का कारण बनेगा. एसे समय में व्यक्ति के लिये यात्रा स्थगित करना लाभकारी रहता है.

(ख) जन्म पक्षी व क्रियामान पक्षी जब मित्र हो तो यात्रा सुखद रहेगी (When the birth-bird and ruling bird are friends). इस स्थिति में जन्म पक्षी राज करने की स्थिति में भी होना अनिवार्य है.

2. जन्म पक्षी के चलने की क्रिया के दौरान यात्रा करना: (Journey while the birth bird is in walking state)
किसी व्यक्ति का जन्म पक्षी जब चलने की क्रिया में व्यस्त हो तो उस समय में यात्रा करना व्यक्ति के लिये  व्यर्थ होता है. ऎसे में व्यक्ति बेकार घूम कर बिना अपने लक्ष्य की प्राप्ति किये वापस आता है. इस दौरान उसे रास्ते में अच्छा खाना मिलने की संभावनाएं भी कम होती है. तथा इस समय विशेष में मित्रों से भी व्यक्ति के संबध खराब होने की संभावना है.

एसी यात्रा करने के बाद व्यक्ति बाद में पछताता है. की काश मैनें इस समय में यात्रा न की होती. यह समय व्यक्ति को अपनी यात्रा के लक्ष्य से भी भटका सकता है. दूसरें लोग रास्ता बताने के स्थान पर व्यक्ति को दिशाभ्रमित कर सकते है.

इस समय में अगर वह अपने होने वाले जीवन साथी से मिलने जा रहा है तो रिश्ते में असफलता का सामना करना पडता है
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होटल प्रबन्धन में सफलता के लिये ज्योतिष योग (Astrology & Success in Hotel Management)

1. आवश्यक भाव: - दूसरा, चौथा, छठा, सातवां व दशवां घर. (Important House - 2nd, Fourth, Sixth, Seventh, Tenth)
कुण्डली का दूसरा घर भोजन का घर है.  होटल व्यवसाय के लिये चौथा घर (the fourth house is considered for success in hotel management) इसलिये महत्व रखता है. क्योकि चौथे भाव से घर का सुख देखा जाता है. और व्यक्ति होटलों में भी घर के समान सुख होने की कामना करता है. प्रत्येक होटल जाने वाला प्राणी वहां घर की सुविधाएं खोजता है.

होटल में व्यक्ति तब ही रहने के लिये जाता है जब वह घर से दूर हो. छठे घर को सेवा का घर कहते है. सातवां घर चौथे घर से चौथा है. इसलिये इसका महत्व इस क्षेत्र में है. होटल व्यवसाय में अत्यधिक धन व श्रम की आवश्यकता होती है.

व्यक्ति अगर इस काम को स्वतंत्र रुप से अपनाता है तो सर्व प्रथम उसकी कुडण्ली में धन भाव (Dhan Bhava) अर्थात दूसरा, नवम व एकादश भावों पर शुभ प्रभाव हो तो व्यक्ति के अत्यधिक धन प्राप्ति की संभावनाएं बनती है.

2. आवश्यक ग्रह: शुक्र, राहु, चन्द्र 
भावों के अतिरिक्त व्यवसाय को जानने के लिये ग्रहों को भी अवश्य देखा जाता है. शुक्र होटल व्यवसाय से जुडे सभी व्यक्तियों की कुण्डली में विशेष महत्व रखता है. राहु का प्रभाव (Influence of Rahu in Horoscope) इसलिये देखा जाता है कि व्यक्ति में अन्य से हटकर   विशिष्टताएं है या नहीं. चन्द्र की भूमिका भी सेवा के कामों में अहम होती है. इन तीनों ग्रहों का संबन्ध छठे/बारहवे, लग्न/सप्तम, दूसरे/आठवें घर से या इनके स्वामियों से होने पर व्यक्ति को अपने व्यवसाय में सफलता मिलती है.

3. अमात्यकारक की महत्वपूर्ण भूमिका (Role of Amatyakaraka)
व्यक्ति के व्यवसाय निर्धारण में अमात्यकारक का अपना स्थान है. जिस व्यक्ति की कुण्डली में अमात्यकारक ग्रह पर राहु या शुक्र का प्रभाव हो वह होटल प्रबन्धन के क्षेत्र में सफल होता है. अमात्यकारक पराशरी ज्योतिष (Parashari Astrology) का हिस्सा न होकर जैमिनी ज्योतिष (Jaimini Astrology) का भाग है. इसके प्रयोग से व्यक्ति का पेशा आसानी के जाना जा सकता है.

4. नवांश व दशमांश कुण्डली का योगदान (Role of navamsha and dashmamsha Kundali)
ज्योतिष में मात्र जन्म कुण्डली के विश्लेषण से कुछ कहना हमेशा सही नहीं होता है. इसमें बनने वाले योगों की पुष्टि के लिये नवांश कुण्डली (Navamsha Kundli) को देखा जाता है. तथा दशमांश कुण्डली (Dashamsha Kundli)  को व्यवसाय के सूक्ष्म विश्लेषण के लिये देखा जाता है. इन तीनों कुण्डलियों से एक समान योग निकल के आने पर निकाले गये निर्णयों के विषय में कोई संदेह नहीं रह जाता है. तीनों में से दो का झुकाव जिस क्षेत्र की ओर अधिक हो उसी क्षेत्र में व्यक्ति को सफलता मिलती है.

नवांश व दशमांश कुण्डली में राहु/शुक्र का अन्य ग्रहों से संबन्ध व्यक्ति को होटल व्यवसाय की ओर लेकर जाता है. प्रबन्धन से संबन्धित ग्रह गुरु है. दशमेश से गुरु का संबन्ध व्यक्ति को प्रबन्धन गुरु बनाता है. मंगल का प्रभाव होटल नर्माण से जुडे काम करने की योग्यता देता है. बुध स्वागत करने की विशिष्टता देता है. साथ ही हिसाब किताब रखने मे भी रुचि दर्शाता है. शनि का प्रभाव व्यक्ति को सफाई, रख रखाव (हाउस किपिंग) के काम में दक्षता देता है.

5. उचित दशाएं:
राहु/ शुक्र की दशा / अन्तर्दशा में व्यक्ति की आयु आजीविका से कमाने की हो तथा ग्रह योग भी हो तो इस व्यवसाय में आय प्राप्ति की संभावना बनती है. मिलने वाली दशाओं का सीधा सम्बन्ध दशम/दशमेश से होने के साथ- साथ सम्बन्धित ग्रह व भावों से हो जाये तो व्यक्ति को होटल के क्षेत्र में सफलता अवश्य मिलती है.

6. कुण्डली के अन्य योग 

  • (क)  कुण्डली में इस उद्दोग के कारक ग्रह मंगल, शुक्र, राहु, शनि आदि में से जितने ग्रहों का आपस में संबन्ध बनेगा. यह उतना ही शुभ रहेगा. ये ग्रह व्यक्ति के धन भाव में स्थित होकर धन प्राप्ति में सहायक होते है. अथवा कुण्डली में भाव नवम, दशम, व एकादश के स्वामी शुभ स्थानों में होकर मंगल व शुक्र आदि से संबध बनाये तो व्यक्ति को इस क्षेत्र में विशेष सफलता मिलती है.
  • (ख)  कुण्डली में तीसरे घर का स्वामी स्वग्रही होकर नवम घर में स्थित हो जहां से वह लग्नेश व दशमेश को देखे तथा लग्न में मंगल व शुक्र एक साथ स्थित हो अथवा राहु या शनि से दृ्ष्टि संबध रखे तो व्यक्ति को होटल के व्यवसाय में सफलता मिलती है.
  • (ग)  लग्न में बुध, मंगल, शुक्र अथवा शनि की राशि में हो तथा दूसरे व एकादश घर पर पाप प्रभाव न हों, चतुर्थ घर के स्वामी का दशमेश व एकादशमेश या लग्न भाव से संबध हो तो व्यक्ति को होटल के पेशे में यश व सफलता मिलती है

अंक ज्योतिष से विवाह


अंक ज्योंतिष अपने नाम के अनुसार अंक पर आधारित है. अंक शास्त्र के अनुसार सृष्टि के सभी गोचर और अगोचर तत्वों अपना एक निश्चत अंक होता है. अंकों के बीच जब ताल मेल नहीं होता है तब वे अशुभ या विपरीत परिणाम देते हैं. अंकशास्त्र में मुख्य रूप से नामांक, मूलांक और भाग्यांक इन तीन विशेष अंकों को आधार मानकर फलादेश किया जाता है. विवाह के संदर्भ में भी इन्हीं तीन प्रकार के अंकों के बीच सम्बन्ध को देखा जाता है. अगर वर और वधू के अंक आपस में मेल खाते हैं तो विवाह हो सकता है. अगर अंक मेल नहीं खाते हैं तो इसका उपाय करना होता है ताकि अंकों के मध्य मधुर सम्बन्ध स्थापित हो सके.
वैदिक ज्योतिष (Vedic Astrology) एवं उसके समानांतर चलने वाली ज्योतिष विधाओं में वर वधु के वैवाहिक जीवन का आंकलन करने के लिए जिस प्रकार से कुण्डली से गुण मिलाया जाता ठीक उसी प्रकार अंकशास्त्र में अंकों को मिलाकर (Numerology Marriage compatibility) वर वधू के वैवाहिक जीवन का आंकलन किया जाता है.
अंकशास्त्र से वर वधू का गुण मिलान (Matching for marriage through Numerology)
अंकशास्त्र में वर एवं वधू के वैवाहिक गुण मिलान के लिए, अंकशास्त्र के प्रमुख तीन अंकों में से नामांक ज्ञात किया जाता है. नामांक ज्ञात करने के लिए दोनों के नामों को अंग्रेजी के अलग अलग लिखा जाता है. नाम लिखने के बाद सभी अक्षरों के अंकों को जोड़ा जाता है जिससे नामांक ज्ञात होता है. ध्यान रखने योग्य तथ्य यह है कि अगर मूलक 9 से अधिक हो तो योग से प्राप्त संख्या को दो भागों में बांटकर पुन: योग किया जाता है. इस प्रकार जो अंक आता है वह नामांक होता है. उदाहरण से योग 32 आने पर 3+2=5. वर का अंक 5 हो और कन्या का अंक 8 तो दोनों के बीच सहयोगात्मक सम्बन्ध रहेगा, अंकशास्त्र का यह नियम है.
वर वधू के नामांक का फल (Matching by Name Number)
अंकशास्त्र के नियम के अनुसार अगर वर का नामांक 1 है और वधू का नामांक भी एक है तो दोनों में समान भावना एवं प्रतिस्पर्धा रहेगी जिससे पारिवारिक जीवन में कलह की स्थिति होगी. कन्या का नामांक 2 होने पर किसी कारण से दोनों के बीच तनाव की स्थिति बनी रहती है. वर 1 नामांक का हो और कन्या तीन नामांक की तो उत्तम रहता है दोनों के बीच प्रेम और परस्पर सहयोगात्मक सम्बन्ध रहता है. कन्या 4 नामंक की होने पर पति पत्नी के बीच अकारण विवाद होता रहता है और जिससे गृहस्थी में अशांति रहती है. पंचम नामंक की कन्या के साथ गृहस्थ जीवन सुखमय रहता है. सप्तम और नवम नामाक की कन्या भी 1 नामांक के वर के साथ सुखमय वैवाहिक जीवन का आनन्द लेती है जबकि षष्टम और अष्टम नामांक की कन्या और 1 नमांक का वर होने पर वैवाहिक जीवन के सुख में कमी आती है.
वर का नामांक 2 हो और कन्या 1 व 7 नामांक की हो तब वैवाहिक जीवन के सुख में बाधा आती है. 2 नामांक का वर इन दो नामांक की कन्या के अलावा अन्य नामांक वाली कन्या के साथ विवाह करता है तो वैवाहिक जीवन आनन्दमय और सुखमय रहता है. तीन नामांक की कन्या हो और वर 2 नामांक का तो जीवन सुखी होता है परंतु सुख दुख धूप छांव की तरह होता है. वर 3 नामांक का हो और कन्या तीन, चार अथवा पांच नामांक की हो तब अंकशास्त्र के अनुसार वैवाहिक जीवन उत्तम नहीं रहता है. नामांक तीन का वर और 7 की कन्या होने पर वैवाहिक जीवन में सुख दु:ख लगा रहता है. अन्य नामांक की कन्या का विवाह 3 नामांक के पुरूष से होता है तो पति पत्नी सुखी और आनन्दित रहते हैं.
4 अंक का पुरूष हो और कन्या 2, 4, 5 अंक की हो तब गृहस्थ जीवन उत्तम रहता है. चतुर्थ वर और षष्टम या अष्टम कन्या होने पर वैवाहिक जीवन में अधिक परेशानी नहीं आती है. 4 अंक के वर की शादी इन अंकों के अलावा अन्य अंक की कन्या से होने पर गृहस्थ जीवन में परेशानी आती है. 5 नामांक के वर के लिए 1, 2, 5, 6, 8 नामांक की कन्या उत्तम रहती है. चतुर्थ और सप्तम नामांक की कन्या से साथ गृहस्थ जीवन मिला जुला रहता है जबकि अन्य नामांक की कन्या होने पर गृहस्थ सुख में कमी आती है. षष्टम नामांक के वर के लिए 1एवं  6 अंक की कन्या से विवाह उत्तम होता है. 3, 5, 7, 8 एवं 9 नामांक की कन्या के साथ गृहस्थ जीवन सामान्य रहता है और  2 एवं चार नामांक की कन्या के साथ उत्तम वैवाहिक जीवन नहीं रह पाता.
वर का नामांक 7 होने पर कन्या अगर 1, 3, 6, नामांक की होती है तो पति पत्नी के बीच प्रेम और सहयोगात्मक सम्बन्ध होता है. कन्या अगर 5, 8 अथवा 9 नामंक की होती है तब वैवाहिक जीवन में थोड़ी बहुत परेशानियां आती है परंतु सब सामान्य रहता है. अन्य नामांक की कन्या होने पर पति पत्नी के बीच प्रेम और सहयोगात्मक सम्बन्ध नहीं रह पाता है. आठ नामांक का वर 5, 6 अथवा 7 नामांक की कन्या के साथ विवाह करता है तो दोनों सुखी होते हैं. 2 अथवा 3 नामांक की कन्या से विवाह करता है तो वैवाहिक जीवन सामान्य बना रहता है जबकि अन्य नामांक की कन्या से विवाह करता है तो परेशानी आती है. 9 नामांक के वर के लिए 1, 2, 3, 6 एवं 9 नामांक की कन्या उत्तम होती है जबकि 5 एवं 7 नामांक की कन्या सामान्य होती है. 9 नामांक के वर के लिए 4 और 8 नामांक की कन्या से विवाह करना अंकशास्त्र की दृष्टि से शुभ नही होता ह|        

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