Tuesday, October 26, 2010

कर्क लग्न में नवग्रहों का फल

कर्क लग्न की कुण्डली मे लग्नस्थ सूर्य (Sun in Cancer Ascendant)

कर्क लग्न की कुण्डली में सूर्य द्वितीय भाव का स्वामी होता है (In Cancer, Sun is the lord of the second house).प्रथम भाव में चन्द्रमा की राशि कर्क में होने से यह स्वास्थ्य के सम्बन्ध में कष्टकारी होता है.सूर्य की दशा में स्वास्थ्य को लेकर व्यक्ति परेशान होता है.इनमें अभिमान एवं उग्रता रहती है.इन्हें व्यापार की अपेक्षा नौकरी करना पसंद होता है.सरकारी मामलों में इन्हें परेशानियों का सामना करना होता है.पिता के साथ अनबन रहती है.इन्हें स्थिर होकर बैठना पसंद नहीं होता है.सगे सम्बन्धियों से विरोध का सामना करना होता है.

कर्क लग्न की कुण्डली में लग्नस्थ चन्द्र (Moon in Cancer Ascendant)
चन्द्रमा कर्क लग्न की कुण्डली में लग्नेश होने से शुभ कारक ग्रह होता है.इस लग्न में चन्द्रमा स्वराशि का होता है तो उदार और परोपकारी होता है.इनमें ईश्वर के प्रति आस्था और बड़ों के प्रति सम्मान और आदर होता है.इनका मनोबल ऊँचा रहता है.अपने प्रयास से समाज में उच्च स्थान प्राप्त करते हैं.व्यापार में इन्हें सफलता मिलती है.कला के क्षेत्र में भी इन्हें अच्छी सफलता मिलती है.चन्द्रमा की दृष्टि सप्तम भाव पर होने से जीवनसाथी के सम्बन्ध में उत्तम फल देता है.व्यक्ति को विद्वान एवं ज्ञानवान बनता है.धन भाव चन्द्रमा का प्रभाव होने से आर्थिक स्थिति अच्छी रहती है.विवाह के पश्चात इन्हें विशेष लाभ मिलता है.कटु सत्य एवं स्पष्ट कथन के कारण इन्हें विरोध का भी सामना करना होता है.

कर्क लग्न की कुण्डली मे लग्नस्थ मंगल (Mars in Cancer Ascendant)
मंगल कर्क लग्न की कुण्डली में पंचमेश और दशमेश होता है.यह दशमेश और त्रिकोणेश होने से कर्क लग्न में मंगलकारी होता है (Mars is auspicious in Cancer Ascendant). मंगल के प्रभाव से व्यक्ति क्रोधी और उग्र होता है.इनमें महत्वाकांक्षा अधिक रहती है.राजकीय पक्ष से मंगल इन्हें लाभ प्रदान करता है.प्रथम भाव में बैठा मंगल चतुर्थ भाव एवं अष्टम भाव को देखता है.मंगल की दृष्टि से व्यक्ति को आर्थिक लाभ मिलता रहता है लेकिन व्यय भी उसी अनुपात में होता रहता है.धन संचय कर रख पाना इनके लिए कठिन होता है.वैवाहिक जीवन में मधुरता की कमी रहती है क्योंकि मंगल की दृष्टि से सप्तम भाव प्रभावित होता है.पारिवारिक जीवन कलहपूर्ण रहता है.लग्नस्थ मंगल के प्रभाव से व्यक्ति संतान सुख प्राप्त करता है.स्वभाव में चतुराई और लालच के कारण कभी कभी इन्हें अपमान का भी सामना करना होता है.

कर्क लग्न की कुण्डली में लग्नस्थ बुध (Mercury in Cancer Ascendant)
बुध कर्क लग्न की कुण्डली में अशुभ कारक ग्रह होता है.यह इस लग्न में तृतीय और द्वादश भाव का स्वामी होता है.बुध अगर लग्न भाव में स्थित हो तो व्यक्ति का व्यवहार और आचरण संदेहपूर्ण होता है.आजीविका के तौर पर नौकरी इन्हें पसंद होता है.व्यापार में इनकी रूचि बहुत कम रहती है.अगर ये जल से सम्बन्धित वस्तुओ का करोबार करते हैं तो व्यापार भी इनकें लिए लाभप्रद और उन्नति कारक होता है.इन्हें सगे सम्बन्धियों एवं भाईयों से विशेष लगाव नहीं रहता.सप्तम भाव पर बुध की दृष्टि होने से गृहस्थ जीवन में तनाव बना रहता है.साझेदारों से हानि होती है.शत्रुओं के कारण कठिनाईयो का सामना करना होता है.

कर्क लग्न की कुण्डली में में लग्नस्थ गुरू (Jupiter in Cancer Ascendant)
आपकी जन्म कुण्डली के लग्न भाव में कर्क राशि है अत: आप कर्क लग्न के है.आपकी कुण्डली में गुरू षष्टम एवं नवम भाव का स्वामी है (Jupiter is the lord of the sixth and eighth houses when placed in Ascendant).षष्टम का स्वामी होने से जहां गुरू दूषित होता है वहीं त्रिकोणेश होने से शुभ फलदायी भी होता है.लग्न में बैठा गुरू व्यक्तित्व को आकर्षक बनाता है.यह अपनी पूर्ण दृष्टि से पंचम, सप्तम एवं नवम भाव को देखता है.पंचम भाव में गुरू की दृष्टि संतान के संदर्भ में शुभ फलदायी होती है.सप्तम भाव में जीवनसाथी के विषय में उत्तमता प्रदान करती है.नवम भाव पर दृष्टि होने से भाग्य प्रबल रहता है.जीवन धन धान्य से परिपूर्ण होता है.व्यवहार में उदारता और दायभाव शामिल रहता है.अगर लग्न में स्थित गुरू पाप ग्रहों से दृष्ट अथवा युत हो तो गुरू की शुभता हेतु उपाय करना चाहिए..

कर्क लग्न की कुण्डली में लग्नस्थ शुक्र (Venus in Cancer Ascendant)
चन्द्र की राशि कर्क में शुक्र अकारक ग्रह होता है.यह इस लग्न की कुण्डली में चतुर्थ और एकादश भाव का स्वामी होता है.दो केन्द्र भाव का स्वामी होने से शुक्र को केन्द्राधिपति दोष लगता है.शक्र लग्नस्थ होने से व्यक्ति में साहस की कमी रहती है.इनके मन में अनजाना भय बना रहता है.आर्थिक स्थिति अच्छी रहती है.नौकरी एवं व्यापार दोनों में ही इन्हें अच्छी सफलता मिलती है.शुक्र की दृष्टि सप्तम भाव में स्थित शनि की राशि पर होने से व्यक्ति में काम की भावना अधिक रहती है.स्त्रियों से इनका विशेष लगाव रहता है.

कर्क लग्न की कुण्डली में लग्नस्थ शनि (Saturn in Cancer Ascendant)
कर्क लग्न की कुण्डली में शनि सप्तमेश और अष्टमेश होता है.इस लग्न की कुण्डली में शनि अशुभ, कष्टकारी एवं पीड़ादायक होता है (Saturn gives malefic results when placed in Cancer Ascendant).इस राशि में शनि लग्नस्थ होने से व्यक्ति के स्वास्थ्य में उतार चढ़ाव होता रहता है.व्यक्ति दुबला पतला होता है.इनका स्वभाव विलासी होता है.ये सुख कामी होते हैं.अपना अधिकांश धन भोग विलास में खर्च करते हैं.लग्नस्थ शनि माता पिता के सुख में कमी करता है.संतान के विषय में भी यह कष्टकारी होता है.शनि अपनी पूर्ण दृष्टि से तृतीय, सप्तम एवं दशम भाव को देखता है.इसके कारण से भाईयों एवं कुटुम्बों से विशेष सहयोग नहीं मिल पाता है.गृहस्थी सुख में कमी आती है.शनि आर्थिक लाभ प्रदान करता है तो खर्च के भी कई रास्ते खोल देता है.नेत्र सम्बन्धी रोग की भी संभावना रहती है.
कर्क लग्न की कुण्डली में लग्नस्थ राहु (Rahui n Cancer Ascendant)
राहु कर्क लग्न की कुण्डली में प्रथम भाव में स्थित होने से व्यक्ति को विलासी बनाता है.इनका मन सुख सुविधाओं के प्रति आकर्षित होता है.व्यापार में सफलता प्राप्त करने के लिए इन्हें कठिन परिश्रम करना होता है.नौकरी में इन्हें जल्दी सफलता मिलती है.राहु अपनी सातवीं दृष्टि से सप्तम भाव को देखता है जिससे वैवाहिक जीवन तनावपूर्ण होता है.जीवनसाथी से सहयोग नहीं मिलता है.साझेदारी में नुकसान होता है.

कर्क लग्न की कुण्डली में लग्नस्थ केतु (Ketu in Cancer Ascendant)
कर्क लग्न की कुण्डली मे प्रथम भाव में बैठा केतु स्वास्थ्य को प्रभावित करता है.केतु की दशा के समय स्वास्थ्य में उतार चढ़ाव होता रहता है.समाजिक मान सम्मान एवं प्रतिष्ठा के प्रति ये विशेष उत्सुक होते हैं.इनके गुप्त शत्रु भी होते हैं जिनके कारण परेशानियों का सामना करना होता है.सप्तम भाव पर केतु की दृष्टि इस भाव के फल को मंदा कर देती है.इस भाव के केतु से पीड़ित होने के कारण वैवाहिक जीवन के सुख में कमी आती है.केतु इन्हें विवेहेत्तर सम्बन्ध के लिए भी प्रेरित करता है

वृषभ लग्न में में नवग्रहों का फल

वृषभ लग्न में लग्नस्थ सूर्य (Sun in Taurus Ascendant)

इस लग्न में सूर्य कारक ग्रह एवं चतुर्थेश होता है (Sun is the Karaka and the lord of the fourth house when in Taurus).लग्न भाव में सूर्य अपने शत्रु शुक्र की राशि में स्थित होकर शुभ फल में कमी करता है.माता पिता से इन्हें सामान्य सुख मिलता है.सरकारी क्षेत्र भी इनके लिए सामान्य रहता है.सप्तम भाव पर सूर्य की दृष्टि होने से जीवनसाथी से मतभेद, दाम्पत्य जीवन में तनाव व कष्ट होता है.यह द्विपत्नी योग भी बनाता है.रोजगार में अस्थिरता एवं साझेदारों से परेशानियों का सामना करना होता है.इस लग्न में प्रथम भाव में सूर्य होने से कम उम्र में ही बाल गिरने लगते हैं.
वृषभ लग्न में लग्नस्थ चन्द्र (Moon in Taurus Lagna)
चन्द्रमा इस लग्न में अकारक होता है लेकिन सम ग्रह की राशि में होने से यह सामान्य रूप से उत्तम फल देने वाला होता है (Due to placement in a neutral sign, Moon gives benefic result in Taurus Ascendant).लग्नस्थ चन्द्र के प्रभाव से मनोबल एवं आत्मबल बना रहता है.भाई बंधुओं से सहयोग एवं सुख प्राप्त होता है.वाणी में मिठास एवं मधुरता रहती है.चन्द्रमा अपनी पूर्ण दृष्टि से सप्तम भाव को देखता है.चन्द्रमा की दृष्टि जीवनसाथी के संदर्भ में उत्तम परिणामदायक होता है.जीवनसाथी सुन्दर और आकर्षक होता है.वैवाहिक जीवन सामान्य रूप से सुखमय होता है.आर्थिक स्थिति अच्छी रहती है.

वृषभ लग्न में लग्नस्थ मंगल (Mars in Taurus Ascendant)
वृषभ लग्न की कुण्डली में मंगल सप्तमेश एवं द्वादशेश होता है.यह इस लग्न में सम होता है.प्रथम भाव में उपस्थित मंगल आकर्षक और सुन्दर शरीर प्रदान करता है.इसके प्रभाव से व्यक्तित्व गौरवपूर्ण होता है.आत्मविश्वास भरपूर रहता है.इस लग्न में मंगल सप्तमेश और द्वादशेश होने से साझेदारों से एवं रोजगार में लाभ होता है.देश विदेश की यात्राओं का भी योग बनता रहता है.लग्न में स्थित मंगल की दृष्टि चतुर्थ भाव पर रहती है (When in ascendant, Mars aspects the fourth house) परिणामत: भूमि, भवन, वाहन एवं माता के सुख में कमी आती है.सप्तम भाव से दृष्टि सम्बन्ध होने के कारण विवाह में विलम्ब होता है.इन्हें संतान एवं पत्नी के कारण कष्ट होता है.चोट लगने एवं रक्त विकार की संभावना रहती है.इन्हें कर्ज की स्थिति का भी सामना करना होता है.

वृषभ लग्न में लग्नस्थ बुध (Mercury in Taurus Ascendant)
बुध वृषभ लग्न की कुण्डली में कारक ग्रह होता है.यह इस लग्न में द्वितीयेश और पंचमेश होकर शुभ परिणामदायक होता है.प्रथम भाव में स्थित बुध बुद्धिमान एवं धनवान बनाता है.इन्हें कारोबार में अच्छी सफलता मिलती है.लग्नस्थ बुध विनोदी व्यक्तित्व प्रदान करता है.ऐसा व्यक्ति जीवन को आनन्द और उल्लास के साथ जीने की इच्छा रखता है.इन्हें सरकारी पक्ष से अनुकूलता प्राप्त होती है.जीवनसाथी के संदर्भ में भी यह बुध मंगलकारी होता है.लग्नस्थ बुध सुन्दर और बुद्धिमान जीवनसाथी प्रदान करता है.करोबार एवं रोजगार में लाभ दिलाता है.साझेदारी खूब फलती है.

वृषभ लग्न में लग्नस्थ गुरू (Jupiter in Taurus Ascendant)
गुरू वृषभ लग्न में अकारक होता है और अष्टम एवं एकादश भाव का स्वामी होता है.शत्रु ग्रह की राशि में स्थित गुरू मंदा फल देता है (Due to placement in the sign of an enemy planet, Jupiter gives malefic result).व्यक्ति को स्वास्थ्य सम्बन्धी परेशानियों का सामना करना होता है.आजीविका के विषय में परेशानियों का सामना करना होता है.इन्हें मानसिक परेशानियों का भी सामना करना होता है.परिश्रम के अनुपात में लाभ नहीं मिल पाता है.लग्न मे बैठा गुरू पंचम, सप्तम एवं नवम भाव को देखता है.गुरू की दृष्टि के कारण व्यक्ति का भाग्य मंदा रहता है.गुरू इनके ज्ञान, संतान एवं धर्म को प्रभावित करता है.सप्तम भाव गुरू की दृष्टि में होने से वैवाहिक जीवन में जीवनसाथी से अनुकूल सम्बन्ध नहीं रहता.

वृषभ लग्न में लग्नस्थ शुक्र (Venus in Taurus Ascendant)
शुक्र वृषभ लग्न की कुण्डली में लग्नेश व षष्ठेश होता है.शुक्र लग्नस्थ होकर व्यक्ति को सुन्दर और आकर्षक बनाता है.यह व्यक्ति को आत्मबल एवं आत्मविश्वास प्रदान करता है.षष्ठेश शुक्र रोग और व्याधियां देता है.शुक्र की दशा के समय स्वास्थ्य में उतार चढ़ाव होता रहता है.प्रथम भाव में स्थित शुक्र सप्तम भाव को देखता है जिससे भौतिक सुख की प्राप्ति होती है.वैवाहिक जीवन प्रेमपूर्ण होता है.रोजगार में उत्तमता रहती है.साझेदारों एवं मित्रों से सहयोग मिलता है.

वृषभ लग्न में लग्नस्थ शनि (Saturn in Taurus Ascendant)
वृषभ लग्न की कुण्डली में शनि नवम एवं दशम भाव का स्वामी होता है.यह राशि शनि के मित्र की राशि है.इस राशि में शनि कारक ग्रह होता है.लग्न में वृषभ राशि में बैठा शनि व्यक्ति को अत्यधिक परिश्रमी और कार्य कुशल बनता है.शारीरिक रूप से ताकतवर और पुष्ट बनता है.सरकारी पक्ष से एवं पिता से सहयोग एवं लाभ प्रदान करता है.प्रथम भाव में स्थित शनि की दृष्टि तृतीय, सप्तम एवं दशम भाव पर रहती है.इनका भाग्योदय जन्म स्थान से दूर जाकर होता है.ससुराल पक्ष से लाभ एवं सम्मान प्राप्त होता है.जीवनसाथी से सहयोग प्राप्त होता है.शनि की दृष्टि से विवाह में विलम्ब होता है एवं भाई बंधुओं से सहयोग नहीं मिल पाता है.

वृषभ लग्न में लग्नस्थ राहु (Rahu in Taurus Ascendant)
राहु वृषभ लग्न की कुण्डली में प्रथम भाव में स्थित होने से राहु के गोचर काल में स्वास्थ्य सम्बन्धी परेशानियों का सामना करना होता है.राहु कार्यों में बाधा डालता है और अवरोध पैदा करता है.लगनस्थ राहु व्यक्ति को गुप्त विद्याओं में पारंगत बनाता है.इस भाव में स्थित राहु वैवाहिक जीवन को कलहपूर्ण बनाता है.जीवनसाथी से असहयोग प्राप्त होता है.

वृषभ लग्न में लग्नस्थ केतु (Ketu in Taurus Ascendant)
वृषभ लग्न की कुण्डली में लग्न भाव में स्थित केतु व्यक्ति को अल्पशिक्षित और लालची बनाता है साथ ही परिश्रमी और कर्मठ भी बनाता है.ये अपनी मेहनत और लगन से असंभव कार्य को भी संभव कर लेते हैं.परिश्रमी होने के बावजूद इनमें साहस की कमी रहती है.स्वतंत्र विचार से किसी काम को पूरा करना इनके लिए कठिन होता है.लॉटरी, जुआ एवं सट्टे में इनका धन बर्बाद होता है.

लिखावट से सब कुछ जानिए

हम व्यक्ति के सामाजिक व्यवहार को तीन श्रेणियों में विभाजित कर सकते हैं : 1. बहिर्मुखी
 व्यक्तित्व, 2. अन्तर्मुखी व्यक्तित्व और 3. मघ्यस्थ बहिर्मुखी व्यक्तित्व वाला व्यक्ति समाज 
में प्रत्येक व्यक्ति के साथ मानसिक और संवेदनशील रूप से बिल्कुल एक होकर कार्य करता
 है। कभी भी आराम नहीं करना चाहता हैं, क्योंकि समाज सेवा ही उकसा घर्म होता है और 
उसे संतुष्टि ही सामाजिक कार्यो से प्राप्त होती है। ऎसा व्यक्ति थोडा भारी हाथ से लिखता है
 और इसकी लिखावट दायीं और झुकती हुई होती है। अक्षर बडे-बडे और लिखावट गोलाई
 लिए होती है, यदि बडे अक्षर भारी दबाव के साथ लिखे गये हैं तो व्यक्ति समाज से यह भी 
चाहता है कि उसका घ्यान रखा जाए। अन्तर्मुखी व्यक्तित्व वाले व्यक्ति बचपन में उपेक्षा
 का शिकार समाज की उदासीनता से खिन्न आदि वजहों से अन्तर्मुखी कहलाते हैं। यह 
मनुष्य के प्रति विपरीत व्यवहार रखते हैं तथा सामाजिक व्यवहार को भी कोई मान्यता 
नहीं देते। ऎसे व्यक्तियों की लिखावट बायीं ओर झुकी होती है तथा भारी दबाव से लिखी 
होती है। यह व्यक्ति किसी से अपने मन की बात आसानी से नहीं कहते, शंकालु स्वभाव के 
होते हैं। ऎसे व्यक्ति दृढ निश्चयी होते हैं। कोई इनका निर्णय बदल नहीं सकता। यह मुसीबत 
में घबराते नहीं हैं, शांत रहते हैं। जिनकी लिखावट सीघी होती है वह मघ्यस्थ व्यक्ति कहलाते
 हैं। ज्यादातर लोग इसी श्रेणी में आते हैं। सीघी लिखावट लगभग सभी चिन्ह सही स्थान पर
 लगे हुए लिखावट का झुकाव हमें व्यक्ति की निजी सोच और व्यवहार के बारे में बतालाता है। 
झुकाव से हमें यह भी पता चलता है कि व्यक्ति दिखावा करने वाला है या संकोची है, बातूनी है 
या शांत प्रकृति का है। ऎसा देखा गया है कि अघिकतर लोग सीघा लिखते हैं और इस शैली के
 अनुसार वर्तमान में ही जीते हैं। यह बडे आत्म-विश्वासी होते हैं तथा स्वतंत्र रूप से चिंतन
 करते हैं। इनकी निर्णय लेने की क्षमता भी अच्छी होती है। जिनकी लिखावट का झुकाव
 दायीं और होता है वह व्यक्ति बहिर्मुखी तो होते ही हैं बल्कि सामाजिक प्रवृत्ति और व्यवहार
 कुशलता का पुट भी इनमें रहता है लेकिन सामाजिक प्रकृति होने के कारण यह समाज से
 अपने सामाजिक कार्यो की प्रशंसा की अपेक्षा भी रखते हैं। कर्मशील, भविष्य बनाने की चिंता 
तथा सदा कुछ न कुछ क्रियात्मक करते हुए आगे बढते रहने की इच्छा रहती है। भावनात्मक 
प्रवृत्ति होने के कारण लोगों के प्रति संवेदनशील होते हैं तथा उनके बीच रहना भी पसंद करते हैं।
 यदि व्यक्ति की लिखावट का झुकाव बायीं ओर होता है तो व्यक्ति शांत एवं अकेला जीवन जीने 
की इच्छा रखता है। ऎसे व्यक्ति संवेदनशील होने के अलावा डरपोक भी होते हैं। अपने बनाए हुए
 सीमित दायरे से यह व्यक्ति बाहर नहीं निकल पाते जिसके फलस्वरूप आसानी से मित्र नहीं बना
 पाते तथा किसी से प्रभावित भी नहीं होते हैं। अन्तर्मुखी व्यक्ति होने के कारण ऎसे व्यक्ति सदा
 परिस्थितियों के बारे में सोचते रहते हैं। इनके विचारों में अनेक अन्तर्द्वन्द्व चलते दिखाई पडते हैं।
 यदि व्यक्ति अपनी लिखावट आये दिन बदलते हैं तो यह ठीक नही हैं क्योंकि लिखावट का बार-बार
 बदलना उनकी मानसिक स्थिति का परिचायक है जो कि अस्थिर होने के साथ-साथ अनियंत्रित 
भी होती है

वास्तु समाधान

 यदि भूखंड या बिल्डिंग का आकार नियमित न हो या और यदि प्रकृति के मूलभूत पांच 
तत्व संपति के किसी एक या अधिक तत्वों के अनुरुप नहीं है तो उस तत्व/ तत्वों से 
प्रभावित होने वाली लाभदायक ऊर्जा से वहां रहने वाले लोग वंचित हो जाते हैं। प्रतिकूल
 परिस्थितियों में हमें जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में असाधारण परेशानियां भी झेलनी पड़ सकती हैं।''
इस भूखंड में दक्षिण पश्चिम का कटा होना मालिक को स्थायी तौर पर उस स्थान में नहीं रहने देता।
दक्षिण पश्चिम में नौकर रहने से मालिक पर हावी होने की संभावना बढ़ जाती है।
दक्षिण की सड़क वीथिशूल का काम कर रही है जो आपसी मतभेद, आकस्मिक दुर्घटना और भारी
 धन हानि का कारण बन सकती है।
दक्षिण पूर्व में बोरिंग होना आक्रमण और बदनामी का कारण बनता है।
तकनीकी शिक्षा व लम्बे अनुभव द्वारा बिल्डिंग की उम्र के ज्ञान का अनुमान लगाया गया है।
चूंकि वास्तु ज्ञान के गढ़ माने जाने वाले शहर हैदराबाद में रहकर भी वास्तु दोष दूर नहीं हो सके,
 इसका मतलब कि पहले के मालिक अध्यात्म व समाज में ज्यादा मेलजोल नहीं रखने वाले होने 
चाहिए। यह भी अनुमान है कि बैंक का हैदराबाद में मुख्यालय होने तथा प्रदेश में वास्तु विद्या का 
अत्यधिक प्रचार/प्रसार होने एवं वास्तु विशेषज्ञों की बहुतायत होने के बावजूद मजबूरी में ही बैंक 
ने यह जगह ली होगी तथा लेते ही किसी विशेषज्ञ को दिखाकर ठीक करवाने के प्रयत्न शुरु कर दिये
 होंगे। यदि छः माह प्रशासनिक निर्णय लेने, नक्शे बनने व पास होने के लिए लगाये जाएं तो जो 
निर्माण हुआ है वह सामान्य परिस्थितियों में लगभग एक वर्ष की प्रगति दिखाता है परन्तु ईशान
 (उत्तर-पूर्व) कोना बन्द होने के बाद प्रगति में रुकावट आ जाती है इसलिए दो वर्ष का अनुमान 
लगाया गया।
पं० जी के इतना कुछ बताने पर महाप्रबंधक ने बताया कि वाकई यह इमारत ४० साल पुरानी है
 और कई लोग एक के बाद एक इसे बेच चुके हैं। बैंक के पास लगभग पिछले २ साल से ही है। 
बैंक के कर्जदार ने इसको गिरवी रखकर आयात निर्यात के व्यापार के लिये कुछ कर्ज लिया था
 पर वो व्यक्ति किसी सरकारी परेशानी में फंस गया और उसे काफी नुकसान हो गया।
इससे पहले यह संपति जिस कंपनी की थी उसके साझेदारों में झगड़ा हो गया था ।
उससे पहले जिसके नाम यह प्रॉपर्टी थी उसकी गोली मारकर हत्या कर दी गई थी जिसमें 
स्क्यिोरिटी गार्ड भी शामिल था।
बैंक ने प्रॉपर्टी नीलाम कराने की भरसक कोशिश की, जिससे अपना पैसा वसूल हो जाये पर पुराने 
रिकार्ड को देखते हुये, शहर के बीचों बीच राजभवन मार्ग पर होते हुए भी इस संपति का कोई उचित
 खरीददार नहीं आया, इसलिए अंत में बैंक ने यह अपने नाम कर ली।





उन्होंने आगे बताया कि हमारे कार्यकारी निदेशक पहले मुम्बई में थे वहां से शिफ्ट होकर हैदराबाद 
आये हैं। परिवार मुंबई में ही रहता है और वह स्वयं गैस्ट हाउस के ऊपर वाले तल पर रह रहे है। 
लेकिन वह भी ज्यादातर मुंबई या दिल्ली के दौरे पर रहते हैं। चूंकि वह वास्तु को बहुत मानते हैं 
इसीलिए उन्होंने एक बार मुंबई से प्रसिद्ध वास्तु विशेषज्ञ को बुलाया जो रिलायंस के लिए भी काम
 करते हैं। इसके अतिरिक्त हैदराबाद के जो वास्तुकार (आर्किटैक्ट) इसमें बदलाव कर रहे हैं वे शहर 
के एक बडे+ वास्तु शास्त्री से भी समय समय पर परामर्श करते रहते हैं। उन्हीं की सलाह पर इसी
 प्लाट पर एक कोने में चेयरमैन एवं दूसरे कोने में कार्यकारी निदेशक के लिए घर बन रहे हैं।
 तत्पश्चात इस गैस्ट हाउस में भी काफी परिवर्तन किये जायेंगे।
पं० जी ने पूछा, ÷÷जो निर्माण कार्य चल रहा है क्या उसकी प्रोग्रेस से आप संतुष्ट है? तो उन्होंने
 मना कर दिया। इसका कारण पं० जी ने उत्तर पूर्व कोने का बंद होना बताया। चूंकि बिल्डिंग की
 वास्तु के अनुसार उत्तर पूर्व स्थान/ कमरा पूजा के लिये सर्वोत्तम है परन्तु प्लाट की वास्तु कुछ
 अलग होती है। किसी भी प्लाट पर जो पूर्णतया बना हुआ न हो वहां उत्तर-पूर्व (पानी) उत्तर-पश्चिम 
(हवा) व दक्षिण पूर्व (अग्नि) के कोने को किसी भी कारण से बन्द नहीं करते क्योंकि इन प्रकृति
 की शक्तियों का खुला रहना/चलते रहना ही मुनष्य के जीवन के लिये आवश्यक है। महाप्रबंधक 
महोदय ने माना कि इस बहुमंजिला मन्दिर की जैसे ही पहली छत ड़ली थी तभी से काम बहुत 
धीमा हो गया है।
दक्षिण पश्चिम का गार्ड रुम हटाकर बहुत अच्छा किया है परन्तु उत्तर पूर्व कोने में हवा बन्द 
करना पूर्णतया निषेध है। पं० जी ने सलाह दी कि मंदिर को कोने से हटाकर पूर्व में चारदीवारी
 से हटाकर बनाना ही इसका एकमात्र उपाय है जिससे उसके चारों तरफ खुली परिक्रमा के लिये
 स्थान हो। इसलिये बना हुआ स्ट्रक्चर तोड़ना ही पडे+ेगा।
पं. गोपाल शर्मा जी ने उन्हें आगे समझाया कि हैदराबाद से तिरुपति के रास्ते में एक स्टेशन
 कालहस्ती आता है- जहां एक अति प्राचीन मंदिर है इस मंदिर की अपनी विशिष्ट मान्यता है। 
कालसर्प योग की पूजा के लिए शास्त्रों में त्रयंबकेश्वर के बाद इसी का नाम आता है परन्तु दक्षिण 
पूर्व (अग्नि स्थान) में पानी (नदी) होने से वहां का न ज्यादा नाम है न वहां ज्यादा लोग आते हैं
 तथा पुजारी का वेतन भी भगवान तिरुपति के मंदिर से भेजा जाता है (जो पूर्णतया वास्तु
 अनुरुप बना है) इससे यह सिद्ध होता है कि प्रकृति के नियमों के आगे भगवान भी विवश है

हाथ से जाने अपना भविष्य

वैज्ञानिक अध्ययन से यह पता चलता है कि मस्तिष्क की मूल शिराओं का हाथ के
 अंगूठे से सीधा संबंध है। स्पष्टतः अंगुष्ठ बुद्धि की पृष्ठ भूमि और प्रकृति को दर्शाने
 वाला सबसे महत्वपूर्ण अंग है। बाएं हाथ के अंगूठे से विरासत में मिली 
मानसिक वृति का आकलन किया जाता है और दायें हाथ के अंगूठे से स्वअर्जित
 बुद्धि-चातुर्य और निर्णय क्षमता का अंदाजा लगाना संभव है। अंगूठे और हथेली
 का मिश्रित फल व्यक्ति को अपनी प्रकृति के अनुसार ढाल पाने में सक्षम है। व्यक्ति 
के स्वभाव और बुद्धि की तीक्ष्णता को अंगुष्ठ के बाद अंगुलियों की बनावट और 
मस्तिष्क रेखा सबसे अधिक प्रभावित करती है।
अमेरिकी विद्वान विलियम जार्ज वैन्हम के अनुसार व्यक्ति के हाव-भाव और पहनावे
 से उसके स्वभाव के बारे में आसानी से बताया जा सकता है।
अतीव बुद्धि संपन्न लोगों का अंगुष्ठ पतला और पर्याप्त लंबा होता है। यह पहली अंगुली 
(तर्जनी) से बहुत पृथक भी स्थित होता है। यह व्यक्ति के लचीले स्वभाव को व्यक्त करता है।
 इस प्रकार के लोग किसी भी माहौल में स्वयं को ढाल सकने में कामयाब हो सकते हैं। 
ये काफी सहनशील भी देखे जाते हैं। इन्हें न तो सफलता का ही नशा चढ़ता है और न
 ही विफलता की परिस्थितियों से ही विचलित होते हैं। इनकी सबसे अच्छी विशेषता 
या गुण इनका लक्ष्य के प्रति निरंतरता है। लेकिन यदि अंगुष्ठ का नख पर्व (नाखून वाला भाग)
 यदि बहुत अधिक पतला है तो व्यक्ति अंततः दिवालिया हो जाता है और यदि यह पर्व
 बहुत मोटा गद्दानुमा है तो ऐसा व्यक्ति दूसरों के अधीन रह कर कार्य करता है। यदि नख पर्व
 गोल हो और अंगुलियां छोटी और हथेली में शनि और मंगल का प्रभाव हो तो जातक स्वभाव
 से अपराधी हो सकता है।

अंगुलियां कुल हथेली के चार में से तीन भाग के समक्ष होनी चाहिए। इससे कम होने से जातक कुएं का मेढक होता है। उसके विचारों में संकीर्णता और स्वभाव में अति तक की मितव्ययता होती है। सीमित बुद्धि संपन्न ये जातक भारी और स्थूल कार्यों को ही कर पाते हैं। बौद्धिक कार्य इनके लिए दूर की कौड़ी होती है। अक्सर इनको स्वार्थी भी देखा गया है। इस प्रकार की अंगुलियां यदि विरल भी हो तो आयु का नाश करती हैं।





अंगुलियां के अग्र भाग नुकीले रहने से काल्पनिक पुलाव पकाने की आदत होती है। जिससे व्यक्ति जीवन की वास्तविकता से अनभिज्ञ रहते हुए एक असफल जीवन जीता है।
अंगुलियां लंबी होने से जातक बौद्धिक और सूक्ष्मतम कार्य बड़ी सुगमता से पूर्ण कर लेता है और स्थूल कार्य भी इसकी पहुंच से बाहर नहीं होते हैं। बहुत बार इस प्रकार के जातक नेतृत्व करते देखे जाते हैं। 
इस प्रकार की अंगुलियों के साथ हाथ यदि बड़ा और चमसाकार हो तो जातक अपनी क्षमता
 का लोहा समाज को मनवा लेता है। लंबी अंगुलियों के साथ यदि हथेली में शुक्र मुद्रिका भी हो
 तो जातक सर्वगुण संपन्न होते हुए भी भावुकतावश प्रगति के मार्ग में पिछड़ जाता है। शनि 
मुद्रिका होने से दुर्भाग्य साथ नहीं छोड़ता है। इस प्रकार के जातक अपनी योग्यता और क्षमता
 का पूर्ण दोहन नहीं कर पाते हैं। जिसके कारण इनको जीवन में सीमित उपलब्धियों से ही 
संतोष करना होता है। चंद्रमा का बहुत प्रभाव होने से जातक पर यथार्तता की अपेक्षा कल्पना
 हावि रहती है।
अंगुलियों के नाखून जब त्वचा में अंदर तक धंसे हों, साथ ही ये आकार में सामान्य से छोटे
 हों तो जातक बुद्धि कमजोर होती है। इसकी मनोवृत्ति सीमित और आचरण बचकाना होता है।
 ये जातक आजीविका हेतु इस प्रकार के कार्य करते पाए जाते हैं, जिनमें बौद्धिक / शारीरिक
 मेहनत न के बराबर होते होती है।
कनिष्ठा सामान्य से अधिक छोटी हो तो जातक मूर्ख होता है। कनिष्ठा के टेढी रहने से
 जातक अविश्वसनीय होता है। टेढ़ी कनिष्ठा को कुछ विद्वान चोरी करने की वृत्ति से भी 
जोड़ते हैं। 
लेकिन इसे तभी प्रभावी मानना चाहिए जब हथेली में मंगल विपरीत हो, क्योंकि ग्रहों में
 मंगल चोर है।
अंगुलियों का बैंक बैलेंस से सीधा संबंध है। केवल अंगुलियों का निरक्षण कर लेने भर से ही 
इस तथ्य का अंदाजा लगाया जा सकता है कि व्यक्ति में धन संग्रह की प्रवृत्ति कहां तक है। 
तर्जनी (पहली अंगुली) और मध्यमा (बीच की अंगुली) यदि बिरल (मध्य में छिद्र) हों तो
 निश्चित रूप से जीवन के मध्य काल के बाद ही धन का संग्रह हो पाता है। यदि कनिष्ठा
 विरल हो तो वृद्धावस्था अर्थाभाव में व्यतीत होती है। यदि अंगुलियों के मूल पर्व गद्देदार 
और स्थूल हों तो जीवन में विलास का आधिक्य रहता है। सभी अंगुलियों के विरल होने 
से जीवन पर्यन्त धन की कमी रहती है। सीधी, चिकनी और गोल अंगुलियां धन को 
बढ़ा देती है। सूखी अंगुलियां धन का नाश करती हैं।

वे अंगुलियां जिनके जोड़ों की गांठें बहुत उभरी हुई हों, संवेदनशील और कंजूस प्रवृत्ति दर्शाती हैं। लेकिन ऐसी उंगलियों वाले जातक कड़ी मेहनत कर सकते हैं। यही इनकी सफलता का रहस्य होता है।
अंगूठे और अंगुलियों के आकार-प्रकार के अलावा हाथ की बनावट से हमें काफी कुछ 
जानकारी प्राप्त होती है।
समचौरस हथेली के स्वामी व्यवहारिक होते हैं। लेकिन ऐसे लोग स्वार्थी भी होंगे। साथ
 ही समय आने पर किसी को धोखा भी दे सकते हैं। इसके विपरीत लंबवत हथेली के 
]स्वामी भावुक और कल्पनालोक में विचरण करने वाले लोग होंगे। आमतौर पर ये 
जीवन में स्वतंत्र रूप से सफल नहीं रहते हैं। तथापि ये नौकरी में ज्यादा सफल रहते हैं।
 ऐसे लोग यदि स्वयं का व्यवसाय स्थापित करें तो प्रायः लंबा नुकसान उठाते हैं।
 अतः ऐसे लोगों को हमेशा नौकरी को तरजीह देनी चाहिए।
हथेली का पृष्ठभाग समतल या कुछ उभार लेते हुए होना चाहिए। ऐसी हथेली का जातक व्यवहारिक होता है। यदि हथेली का करपृष्ठ बहुत अधिक उभार लिए हुए हो तो प्रायः व्यक्ति कर्कश स्वभाव और झगड़ालू होता है।
हथेली में जब गहरा गढ़ा हो तो प्रायः जातक अपनी बात पर कायम नहीं रह पाता है। 
ऐसे लोग जीवन मे अत्यंत संघर्ष के उपरांत ही कुछ हासिल कर पाते हैं।
हथेली का पृष्ठ भाग और कलाई हमेशा समतल होनी चाहिए। यदि दोनों में ज्यादा अंतर है 
तो यह जातक को समाज में स्थापित होने से रोकती है। ऐसे लोग अपने परिजनों से
 विरोध करते हैं। समाज में इनकी प्रतिष्ठा कम होती है।
जिन हाथों में शनि-मंगल का प्रभाव हो वे लोग कानूनी समस्याओं का सामना करते हैं।
 कुछ मामलों में ऐसे लोग अपराधी भी हो सकते हैं।
हथेली में राहु का प्रभाव होने पर जातक बुरी आदतों का शिकार होता है। वह धर्मभ्रष्ट 
भी हो सकता है। मदिरापान कर सकता है या अभक्षण का भी भक्षण कर सकता है।03%

राजभंग योग

राजभंग योग

 

ज्योतिष शास्त्र में जन्म कुंडली मे पाए गए राजयोगों का महत्व सर्वदा सर्वमान्य है। उच्च ग्रह व केंद्र त्रिकोण का संबंध होने से राजयोग मिलता है व इनसे लाभान्वित होकर अनेक जातक अपने जीवनकाल में सफलता के शिखर पर पहुंचे हैं। भाग्य की विडंबना है व संसार का यह नियम है कि समय सर्वदा एक सा नहीं होता। जहां एक ओर उच्च कोटि के राजयोग फलित हुए दिखाई पड़े हैं वहीं दूसरी ओर उन्हीं राजयोगों का भंग होना भी फलीभूत हुआ है।

कुंडली सं. 1 :

भगवान श्री रामचंद्र जी की कुंडली में राजयोग भंग स्पष्ट दिखाई पड़ता है। लग्नस्थ शुभ सौम्य ग्रहों, उच्चस्थ गुरु व स्वगृही चंद्र पर प्राकृतिक पाप ग्रहों मंगल व शनि की पूर्ण दृष्टि गुरु व चंद्र द्वारा स्थापित राजयोग को भंग कर रही है। यही कारण है कि राजा के घर में जन्म लेने पर भी श्री राम को बनवासी होना पड़ा। यही नहीं सप्तमेश शनि अपनी उच्चस्थ राशि में चतुर्थ केंद्र में पंचमहापुरुष योगों में से शशयोग निर्मित कर रहा है किंतु शनि का अपनी उच्च राशि में वक्री होने के कारण श्री राम का यह राजयोग भंग हुआ व उन्हें अपनी भार्या का वियोग सहना पड़ा।

कुंडली सं. २ :

श्री मुरारजी देसाई की मिथुन लग्न की जन्मपत्री में षष्ठेश व एकादशेश मंगल उच्चस्थ होकर अष्टम भाव में स्थित हैं बुध व शुक्र के राजयोग को भंग कर रहे हैं। तीन-तीन ग्रह उच्चस्थ होने के बावजूद उनका राजनीतिक जीवन विवादास्पद रहा है। कर्मेश व केंद्राधिपति दोष से दूषित होकर गुरु द्वितीय भाव में उच्चस्थ और वक्री बैठा हुआ है। अष्टम नवमेश शनि पंचम त्रिकोण भाव में उच्चस्थ और वक्री है। फलतः उन्हें प्रधानमंत्री की गद्दी तो मिली किंतु ज्यादा समय तक पदासीन नहीं रह सके। अष्टम भाव में उच्चस्थ मंगल ने भी उन्हें राजयोग का फल अधिक दिनों तक भोगने नहीं दिया।
कुंडली 
स :
कोई भी ग्रह चाहे उच्च का हो, बलवान स्थिति में हो, उसके साथ यदि सूर्य/चंद्र हो तो राजयोग भंग हो जाता है। कुंडली सं. ३ में नवमेश व दशमेश बुध व चंद्र के दशम भाव में होने के बावजूद उनके सूर्य के साथ होने से राजयोग भंग हो गया। जातक कई बार संसद सदस्य बने किंतु मंत्री नहीं बन पाए।
उर्पयुक्त उदाहरण से एक और नियम की पुष्टि होती है कि यदि नवमेश व दशमेश राजयोग स्थापित कर रहे हों और उनके साथ बाधकेश हो तो भी राजयोग भंग हो जाता है। उपर्युक्त कुंडली चर लग्न की है और एकादशेश सूर्य बाधक भी है।

कुंडली सं. ४ :

बलवान ग्रह यदि स्तंभित हो जाता है तो राजयोग भंग कर देता है। कुंडली सं. ४ में गुरु को स्थान बल प्राप्त है क्योंकि यहां वह लग्न में स्तंभित है। ६.१०.१९९३ तक जातक को काफी नाम व ख्याति मिली किंतु गुरु की ही महादशा में प्रधानमंत्री बनते बनते रह गए। इनकी गुरु की महादशा ६.१०.२००९ तक है।

कुंडली सं. ५ :

अकारक ग्रह की दशा हो और यदि वह ग्रह अपनी ही दशा अंतर्दशा में फल दे तो बाकी की दशा का राजयोग भंग हो जाता है। कुंडली ५ इसी बात की पुष्टि करती है।
यह जातक शुक्र की महादशा के अंतर्गत शुक्र की अंतर्दशा १७ १२.१९८६ से १७.०४.१९९० के मध्य मंत्री पद पर रहे। मीन लग्न के लिए अकारक ग्रह शुक्र ने अपनी ही दशा व अंतर्दशा में फल देकर बाकी १७ साल शून्य फल दिया व राजयोग भंग किया।

कुंडली सं. ६ :

पूर्ण चंद्र हेते हुए भी भाग्येश चंद्र से कर्मेश सूर्य यदि अष्टमस्थ हो, तो राज योग भंग होता है। कुंडली सं. ६ के जातक प्रधानमंत्री बनते बनते रह गए कारण नवमेश व दशमेश सूर्य व चंद्र आमने सामने होने पर भी विपरीत फल मिला। एक ओर भाग्येश चंद्र के साथ वक्री प्राकृतिक पाप ग्रह तृतीयेश व चतुर्थेश अकारक व नीचस्थ शनि ने भी राजयोग भंग किया तो दूसरी ओर चंद्र से सूर्य अष्टम होने के कारण भी राजयोग भंग हुआ।

कुंडली सं. ७ :

सूर्य चंद्र कमजोर होने पर भी राजयोग भंग होता है। कुंडली सं. ७ पर नजर डालें। इस व्यक्ति की वर्तमान समय में राहु की महादशा चल रही है। जातक मुख्यमंत्री बनने में असफल रहे। भाग्येश सूर्य अपने ही भाग्य स्थान में षष्ठेश व एकादशेश शुक्र के साथ होने से कुछ कमजोर हो गया है। बुध दशम केंद्र में भद्र योग स्थापित करने के बावजूद पूर्ण फल देने में सक्षम नहीं है। लग्नेश गुरु व्यय भाव में, नीचस्थ राहु लग्न में और वर्तमान समय में राहु की महादशा में, कमजोर सूर्य, नीचस्थ चंद्र के कारण राजयोग भंग हुआ। चंद्र मंगल का परिवर्तन होने के अलावा लग्नेश गुरु सहित अष्टमेश चंद्र की बारहवें भाव में स्थिति ने लग्नेश का राजयोग भंग किया है। बुध के पंच महापुरुष योग स्थापित करने के बावजूद उसकी दशा नहीं आई और इसका लाभ जातक को नहीं मिला।

कुंडली सं. ८ :

नवमेश सूर्य तृतीय भाव में अष्टम भाव से अष्टम हो तो राजयोग भंग कर सकता है। इन जातक के जन्म के सातवें वर्ष में ही पिता की मृत्यु हो गई और वह उनकी मृत्यु के पश्चात राजा बने। भाग्येश सूर्य के अष्टम भाव से अष्टम होने के कारण राजयोग भंग हुआ।

कुंडली सं. ९ :

वृश्चिक लग्न के लिए लग्नेश व षष्ठेश कारक होकर पंचम भाव में मंगल उच्चस्थ सप्तमेश व व्ययेश शुक्र के साथ स्थित है किंतु लग्नेश होने के बावजूद पंचम भाव में मंगल ने राजयोग भंग किया है और संतान का सुख इन्हें नहीं मिला। पंचमेश गुरु षष्ठ भाव में शनि की दृष्टि में भी है। वह सभी निःसंतान योग स्थापित कर रहा है। यही नहीं जातक खुद दत्तक पुत्र हैं व उनके पिता भी दत्तक पुत्र रहे हैं।

आइए अलग-अलग ग्रहों के उच्च भंग पर एक दृष्टि डालें :

गुरु, मकर लग्न के लिए सप्तम भाव में परम उच्च होकर अकारक होते हुए भी हंस योग का फल देता है। किंतु यदि अष्टमेश सूर्य गुरु के साथ सप्तम भाव में स्थित हो तो राजयोग भंग हो जाता है।
कन्या लग्न के लिए यदि मंगल पंचम त्रिकोण भाव में शनि के साथ मकर राशि में हो, तो षष्ठेश शनि के कारण उच्चस्थ होने के बावजूद मंगल का उच्च भंग हो जाता है।
सूर्य कन्या लग्न में द्वादशेश होकर अष्टम भाव में उच्चस्थ हो जाता है किंतु यदि शनि साथ हो, तो अपनी उच्च राशि का फल देने में सक्षम नहीं होता।
शुक्र मिथुन लग्न में दशम केंद्र में अपनी उच्चस्थ राशि में मालव्य योग बनाता है किंतु यदि एकादशेश व षष्ठेश मंगल इसके साथ हो तो मालव्य योग को भंग कर देता है।
बुध अपनी उच्च राशि में कन्या लग्न में स्थान बल प्राप्त करने के साथ-साथ भद्र योग स्थापित करता है किंतु सूर्य एवं मंगल के साथ होने से यह राजयोग भी भंग हो जाता है।
कभी-कभी पांच ग्रह भी उच्च के होकर, जैसे कर्क राशि में २८द्घ का गुरु, कन्या में ०द्घ का बुध, तुला में २८द्घ का शुक्र, मेष में २९द्घ का सूर्य व मकर में २९द्घ का मंगल, राजयोग का आंशिक फल ही दे पाते हैं।
हमारी भूतपूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय श्रीमती इंदिरा गांधी की कुंडली में छः ग्रहों के परिवर्तन ने उनहें जबरदस्त राजयोग दिया जिसके कारण उन्होंने लगभग १८ वर्ष तक देश के शासन की बागडोर संभाली। किंतु उनका भी विपरीत समय चला, अकारक ग्रह शनि की महादशा में शुक्र की अंतर्दशा चली। उत्तराकालामृत के अनुसार यदि शुक्र व शनि दोनों बलवान हों, तो शनि की महादशा में शुक्र का अंतर व शुक्र की महादशा में शनि का अंतर को कठिनाई का समय साबित होता है। श्रीमती गांधी को भी शनि की महादशा में शुक्र की अंतर्दशा के दौरान अत्यंत विषम परिस्थितियों का सामना करना पड़ा और वह चुनाव हार गईं। उस समय उनका राजयोग भंग हुआ था। अतः यह कहना उचित होगा कि अकारक ग्रह की दशा - अंतर्दशा व बुरा समय भी राजयोग भंग करने में सक्षम होता है।
लग्न से छठे, सातवें या आठवें भाव में प्राकृतिक शुभ ग्रह हों या किसी एक घर में भी शुभ ग्रह हो तो लग्नाधिराज योग का शुभ फल मिलता है, किंतु यदि उस शुभ ग्रह के साथ एक भी पाप ग्रह हो तो उस लग्नाधिराज योग से प्राप्त राजयोग भंग हो जाता है।
इस प्रकार ऐसे अनेक उदाहरण हैं जहां या तो राजयोग भंग हुए हैं या सिर्फ आंशिक ही मिले हैं।
जीवन का अर्थ संघर्ष है। उतार-चढ़ाव जिंदगी के दो पहलू हैं। जीवन के संघर्षों से जुझते हुए निरंतर आगे बढ़ने का प्रयास करते रहना ही हमारा कर्तव्य है। सफलता मिलना या न मिलना भाग्य का खेल है। पुरुषार्थ के माध्यम से ही हम अपने लक्ष्य को प्राप्त कर सकते हैं। अतः राजयोग भंग होने पर भी मनुष्य को हार न मान कर अपने लक्ष्य के प्रति अडिग रहकर कर्म करते रहना चाहिए क्योंकि परिश्रम ही सफलता की कुंजी है

अंकों से जानें अपना कैरियर

अधिकतर लोगों की यह समझ में नहीं आता कि न्यूमरोलॉजी किस तरह से काम करती है, लेकिन कुछ बुनियादी बातों को समझना मुश्किल नहीं है। आपको सिर्फ अपनी जन्मतिथि की जरूरत है ताकि आप अपना बर्थ नंबर जान सकें। मसलन अगर आप किसी माह की 29 तारीख को पैदा हुए हैं, तो आपका बर्थ नंबर होगा 2+9 =11 और फिर 1+1 = 2 यानी 2 आपका बर्थ नंबर है। 

एक :- अगर आपका बर्थ नंबर एक है तो आपका झुकाव रचनात्मक कार्यों की ओर होगा और आप हमेशा नए विचारों से भरे रहेंगे। आप सफल होंगे बतौर डिजाइनर, ग्रुप लीडर, फिल्म मेकर या आविष्कारक।

दो :- नंबर दो का संबंध हारमनी और साथ से है। नृत्य, संगीत, कविता और गणित आपके लिए अच्छे विकल्प हैं। नंबर दो से व्यक्ति महान शोधकर्ता बनते हैं।

तीन :- चंचलता और खुलापन नंबर तीन के विशेष गुण हैं। कम्युनिकेशन और मनोरंजन ऐसे क्षेत्र हैं जिनमें आप प्रयास कर सकते हैं और सफल भी हो सकते हैं। आपके लिए अच्छे करियर विकल्प हैं- एक्टिंग, म्यूजिक, राइटिंग और जर्नलिज्म। आप फैशन डिजाइन और मॉडलिंग के बारे में भी सोच सकते हैं।


ND
चार :- अगर आप नंबर चार हैं तो अधिक संभावना है कि आप व्यावहारिक व्यक्ति होंगे, दृढ़ निश्चय और अंदरूनी शक्ति वाले। आप इंजीनियर, बिल्डर, प्रोग्रामर, अकाउंटेंट, आर्किटेक्ट, इकोलॉजिस्ट या मैकेनिक के रूप में बेहतर रहेंगे।

पाँच :- नंबर पाँच आपको एडवेंचरस बनाता है। अपने सपने साकार करें और उन राहों से बचें जिन पर लोग पहले चल चुके हैं। खोजी पत्रकारिता, प्रकाशन, विज्ञापन, स्टॉक्स, ट्रेवल, लेखन या एविएशन आपके लिए बेहतर रहेंगे।

छः :- समाजसेवा आपका प्राकृतिक स्वभाव है और सेवक होने के नाते आप अध्यापक, सोशल वर्कर, मेडिकल प्रोफेशनल, कुक या सिविल सर्वेंट के रूप में बेहतर रहेंगे।

सात :- नंबर सात बहुत अधिक अंतर्ज्ञानी होते हैं। आपको वैज्ञानिक, मनोचिकित्सक, जाँचकर्ता, दार्शनिक, जासूस या मिस्ट्री लेखक के रूप में अधिक सफलता मिलेगी।

आठ :- नेतृत्व और दूसरों को अपने मुताबिक ढाल लेना नंबर आठ की विशेषता है। आप बेहतर सेल्स मैनेजर, बैंकर, स्टॉक ब्रोकर, मैनेजिंग डायरेक्टर या एथलिट के रूप में चमक सकते हैं।

नौ :- नंबर नौ को मानव मन की अच्छी समझ होती है और ये दूसरों को प्रेरित भी करते हैं। आप लेक्चरर, फिजिशियन, मानवतावादी, वकील या चित्रकार बनने को प्राथमिकता दें। 

Saturday, October 23, 2010

दिन की चौघडिया

शुभ चौघडिया - शुभ - अमृत - लाभ      
  से        तक                रवि           सोम          मंगल         बुध         गुरु         शुक्र           शनि


6:00 AM 7:30 AM       उद्बेग         अमृत          रोग          लाभ         शुभ          चर          काल

7:30 AM 9:00 AM       चर             काल          उद्बेग        अमृत        रोग        लाभ           शुभ

9:00 AM 10:30 AM    लाभ           शुभ            चर           काल        उद्बेग        अमृत        रोग

10:30 AM 12:00 PM   अमृत        रोग            लाभ           शुभ         चर          काल          उद्बेग

12:00 PM 1:30 PM      काल         उद्बेग          अमृत          रोग         लाभ        शुभ           चर

1:30 PM 3:00 PM        शुभ           चर              काल         उद्बेग       अमृत       रोग           लाभ

3:00 PM 4:30 PM       रोग            लाभ             शुभ          चर          काल        उद्बेग         अमृत

4:30 PM 6:00 PM        उद्बेग         अमृत            रोग         लाभ          शुभ        चर            काल

Thursday, October 21, 2010

मेष राशि स्वभाव और कार्य

 आप हमेशा जल्दबाजी में रहते हैं तथा आराम से बैठ कर खाना खाने का समय आपके पास कभी भी नहीं होता। आपके खान-पान की आदतों से आपकी व्यस्त दिनचर्या का अंदाज़ा लगया जा सकता है। आपके भोजन में स्टार्च तथा तली-भुनी चीज़ों की अधिकता होती है तथा प्रेटीन ताजे फल व सब्जियों की कमी रहती है, जिसके कारण आपका पेट खराब रहता है तथा दिल का दौरा भी पड़ सकता है। आपको संतुलित खाना खाना चाहिए तथा आराम से खाना खाने के लिए समय जरूर निकालना चाहिए। कैफीन की मात्रा को भी संतुलित रखना बहुत जरूरी है क्योंकि इससे तनाव ही बढ़ता है। नियमित रूप से हल्का व्यायाम करना भी आपके लिए जरूरी है। व्यायाम करते समय आप इस बात का ध्यान रखें कि आप ज्यादा कठिन व्यायाम ना करें। रात में खाना खाने के बाद धीरे-धीरे घूमने से भी बड़ा लाभ हो सकता है। आपको चोट भी जल्दी लग जाती है, इसलिए अपना ध्यान रखें। हालांकि आप बहुत लंबे नहीं होते, लेकिन आपकी चौकोर संरचना भी इस बात का एहसास कराती है कि आप स्वस्थ हैं। आपमें से ज्यादातर लोगों की माँसपेशियाँ मजबूत तथा मुख का आकार संतुलित होता है। हालांकि आप अपनी राशि के चिन्ह भेड़ की तरह मजबूत होते हैं, लेकिन फिर भी आपको अपने खानपान तथा व्यायाम पर पूरा ध्यान देना चाहिए वरना आपके शरीर के मध्य भाग में वजन बढ़ सकता है। सिर, आँख तथा चेहरा आपके कोमल हिस्से होते हैं। आपको अक्सर सिर दर्द की शिकायत रहती है, इसलिए आपको अपने सिर पर चोट तथा आग लगने का पूरा ध्यान रखना चाहिए।

मेष राशि स्वभाव

शहर में जब परेड आए तो ये देखना चाहिए कि उसकी अगवाई कौन कर रहा है - वो जरूर कोई मेष राशि वाला ही होगा। आप कोई भी काम ऐसा नहीं करते जिसमें कि आपको असफलता मिले, बल्कि आपका हर काम नई पहचान पाने के लिए होता है। आपको चुनौतियाँ लेना पसंद होता है तथा आप इसमें भी सबसे आगे रहना पसंद करते हैं। आप हमेशा नए विचारों से भरपूर रहते हैं तथा हर समस्या का आसान हल आपके पास जरूर होता है, चाहे समस्या कितनी भी जटिल क्यों ना हो। लेकिन अगर कोई लगातार आपको परेशान करता रहे तो आप काम नहीं कर सकते। अगर आपको आजादी दी जाए तो आप हर चुनौती का मज़ा लेते हैं तथा उसे पूरी कुशलता से हल करने की कोशिश करते हैं। हालांकि आपका साथ सभी को पसंद आता है, लेकिन फिर भी आप सबसे ज्यादा पसंदीदा लोगों में से नहीं होते कदाचित आप इस बात को दिल पर भी नहीं लेते। आपके लिए ईमानदार होना तथा अपने दिमाग की बात को सबके सामने रख पाना ज्यादा महत्वपूर्ण होता है। हालांकि आपको जल्दी गुस्सा नहीं आता, लेकिन अगर आप नाराज़ होते हैं तो फिर इसे छिपा पाना आपके लिए संभव नहीं होता। खुद को शांत करने का फिर एक ही तरीका बचता है कि आप अपनी नाराज़गी जल्दी से जल्दी किसी पर निकाल लें। समूह में काम करते समय भी आप खड़े हो कर सभी का ध्यान अपनी ओर आकर्षित करने में विश्वास रखते हैं। कोई आपको नज़रअंदाज़ करे, ये बात आपको कभी भी पसंद नहीं आती। अगर आपको लगता है कि कोई आपको नज़रअंदाज़ कर रहा है तो ऐसे समय में आपका प्रदर्शन और भी अच्छा होता है। आपके लिए खुद को स्थापित करना जीतने से भी ज्यादा जरूरी होता है। आप जिस भी समूह के सदस्य होते हैं आप उस समूह के लोगों को कभी भी नीचे देखने का मौका नहीं देते। जल्दबाजी की बजाय जो भी निर्णय लें वो शांति से सोच-समझ कर ही लें। मेष राशि वाले काम की शुरुआत तो पूरे उत्साह के साथ करते हैं लेकिन जहाँ बात काम को कुशलता से ख़त्म करने की आती है तो ये काम किसी और को ही करना पड़ता है। कोई भी ऐसा काम ना करें जिससे कोई आपसे नाराज़ हो, इसके लिए आप कूटनीति का सहारा भी ले सकते हैं। ध्यान रखें कि गुस्सा तो किसी को भी आ सकता है।
 

अंक ज्योतिष

     आपका वाहन नम्बर (your vehicle number)

आज के भागमभाग दौर को सुविधाजनक और आसान बनाने के लिये

, वाहन जीवन का अभिन्न अंग बन चुका है. जीवन का यह अभिन्न अंग 

अगर हमें सुविधा देता है तो दुर्घटनाओं से ह्रदयविदारक कष्ट भी पहुंचाता 

है. कुछ समझदार लोगों का मानना होता है कि अगर गाड़ी चालाते समय 

सावधानी रखें तो जीवन मे दुर्घटनायें नही होगी. परंतु बहुत से जगहों पे ये 

देखने को मिलता है कि फलां आदमी बहुत ही आराम से गाड़ी चलाता है 

लेकिन फिर भी दुर्घटना घट गई और फलां आदमी बहुत ही गलत और 

बेढ़ंगे वाहन चलाता है फिर भी कभी कुछ नही होता है.

अगर हुम अंक ज्योतिष की मानें तो ये आदमी के मुलांक या भाग्यांक 

और गाड़ी नम्बर के मुलांक के कारण होता है.मान लें कि आपका मुलांक 

1 है और गाड़ी नम्बर का कुल योग 6 या 8 आ रहा है तो दुर्घटनाओं की 

सम्भावना ज्यादा होती है और अगर 7 आता है तो इसकी सम्भावना कम 

हो जाती है. इसका कारण यह है कि 6 नम्बर मुलांक 1 के साथ शत्रु भाव 

रखता है जब कि 7 मित्र भाव रखता है. इसी प्रकार हर एक नम्बर का मित्र 

नम्बर और शत्रु नम्बर होता है जिसका वर्णन नीचे किया जा रहा है. 

इसकी मदद से आप बहुत हद तक ऐसे अनहोनी से बच सकते है. 

..........रेखा देवी

अगर आपका मुलांक या भाग्यांक 1 आता है तो आपको गाड़ी नम्बर का 

कुल योग 1, 2, 4 या 7 रखना चाहिये. 6 या 8 नम्बर वाला वाहन ना रखें 

तो बेहतर होगा. आप पीले, सुनहरे, अथवा क्रीम रंग का वाहन खरीदें. 

नीले,भुरे, बैगनी या काले रंग की वाहन क्रय करने से बचें.

अगर आपका मुलांक या भाग्यांक 2 आता है तो आपको गाड़ी नम्बर का 

कुल योग 1, 2, 4 या 7 रखना चाहिये. 9 नम्बर वाला वाहन ना रखें तो 

बेहतर होगा. आप सफेद अथवा हल्के रंग का वाहन खरीदें. लाल अथवा 

गुलाबी रंग की वाहन क्रय करने से बचें.

अगर आपका मुलांक या भाग्यांक 3 आता है तो आपको गाड़ी नम्बर का 

कुल योग 3,6, या 9 रखना चाहिये. 5 या 8 नम्बर वाला वाहन ना रखें तो 

बेहतर होगा. आप पीले, बैंगनी , अथवा गुलाबी रंग का वाहन खरीदें. हल्के 

हरे सफेद ,भुरे रंग की वाहन क्रय करने से बचें.

अगर आपका मुलांक या भाग्यांक 4 आता है तो आपको गाड़ी नम्बर का 

कुल योग 1, 2, 4 या 7 रखना चाहिये. 9, 6 या 8 नम्बर वाला वाहन ना 

रखें तो बेहतर होगा. आप नीले अथवा भुरे रंग का वाहन खरीदें. गुलाबी या 

काले रंग की वाहन क्रय करने से बचें.

अगर आपका मुलांक या भाग्यांक 5 आता है तो आपको गाड़ी नम्बर का 

कुल योग 5 रखना चाहिये. 3, 9 या 8 नम्बर वाला वाहन ना रखें तो बेहतर 

होगा. आप हल्के हरे, सफेद अथवा भुरे रंग का वाहन खरीदें. पीले, गुलाबी 

या काले रंग की वाहन क्रय करने से बचें.

अगर आपका मुलांक या भाग्यांक 6 आता है तो आपको गाड़ी नम्बर का 

कुल योग 3, 6, या 9 रखना चाहिये. 4 या 8 नम्बर वाला वाहन ना रखें तो 

बेहतर होगा. आप हल्के नीले , गुलबी , अथवा पीले रंग का वाहन खरीदें. 

कले रंग की वाहन क्रय करने से बचें.

अगर आपका मुलांक या भाग्यांक 7 आता है तो आपको गाड़ी नम्बर का 

कुल योग 1, 2, 4 या 7 रखना चाहिये. 9 या 8 नम्बर वाला वाहन ना रखें 

तो बेहतर होगा. आप नीले , अथवा सफेद रंग का वाहन खरीदें.

अगर आपका मुलांक या भाग्यांक 8 आता है तो आपको गाड़ी नम्बर का 

कुल योग 8 रखना चाहिये. 1 या 4 नम्बर वाला वाहन ना रखें तो बेहतर 

होगा. आप काले, नीले, अथवा बैगनी रंग का वाहन खरीदें.

अगर आपका मुलांक या भाग्यांक 9 आता है तो आपको गाड़ी नम्बर का 

कुल योग 9, 3, या 6 रखना चाहिये. 5 या 7 नम्बर वाला वाहन ना रखें तो 

बेहतर होगा. आप लाल , अथवा गुलाबी रंग का वाहन खरीदें.