Saturday, July 16, 2016

ग्रह दृष्टि विचार 2

निष्कर्ष में यह कहना चाहिए की यदि द्रष्ट ग्रह यदि भाव मध्य हो तो ही उस पर दृष्टि का प्रभाव मानना चाहिए। इसके साथ ही यहाँ पर द्रष्टा ग्रह के लिए भी विचारणीय अंश यह है कि

  1. यदि देखने वाला ग्रह निम्न अंशों का है तो उसकी दृष्टि भी कमज़ोर होगी 
  2. यदि देखने वाला ग्रह संधि गत है तो उसकी दृष्टि पूर्ण नहीं होगी अपितु कमज़ोर होगी । 
  3. देखने वाला ग्रह वक्री हो अस्त हो तो भी उसकी दृष्टि बदलेगी । 

ध्यान दें - वक्री की अलग और अस्त ग्रह की दृष्टि में अंतर होगा । 
कुछ ग्रहों की दृष्टि में विशेषता है जिसे भी अवश्य देखना चाहिए ।
श्लोक में बताया गया है कि

  • गुरु  सप्तम के अलावा 5 और 9 स्थान को देखता है। 

आगे बढ़ने के पहले यहाँ विचार करते हैं की गुरु की दृष्टि इन भावों पर होने  के क्या कारण हो सकते हैं
  • गुरु ज्ञान का कारक है सभी ज्योतिषी लोग इस बात को अच्छी तरह से जानते हैं की कुंडली में 5th house knowledge का स्थान है और गुरु उसका नैसर्गिक कारक है । इसलिए गुरु कहीं पर मन्त्रेश्वर के अनुसार भावात् भावं के अनुसार गुरु अपने स्थान 5th स्थान में प्रभाव डालेगा ही ॥ 
  • नवम अर्थात 9th house कुंडली में धर्म यज्ञ आदि का स्थान है और गुरु इसका भी कारक है इसलिए गुरु अपने स्थान से नवम को भी देखेगा। 
अब यहाँ प्रश्न यह उठता है की गुरु की इन तीनो दृष्टि में क्या तीनों ही बलवान हैं ?
यह विचार गुरु गम्य और शोध गम्य है गुरु की कुंडली में स्थिति के अनुसार तीनो में से कोई एक या दो या फिर तीनों राशियाँ प्रभावित होंगी। यहाँ ऐसा भी होता है की कभी कभी तीनों में से कोई भी दृष्टि प्रभावित नहीं है।
आपकी कुंडली में गुरु की क्या भूमिका है और कितना  उसका प्रभाव है और वह कितना फल देगा इसका विचार भी करना चाहिए । इसके लिए अलग से शोध संस्थान में संपर्क करने पर विचार किया जा सकता है।
ध्यान दें - जरुरी नहीं की गुरु आपकी कुंडली में उच्च का है तो वह अच्छा फल देगा और नीच का है तो बुरा । या ये कहें की उच्च होने पर पूरा फल दे और नीच में अधूरा। इन सभी फलों में अंतर होगा। हमने इतने सालो में कई ऐसी कुंडलियों में गुरु को देखा  उच्च का है पर फल नहीं दिया करक था भाव मध्य था फल नहीं दिया और कुछ में नीच था कमज़ोर था फिर भी फल दिया । इन सभी को देखने के बाद हमने कई कुंडलियों में इस पर अध्ययन किया। जो तथ्य मेरे द्वारा दिए जा रहे हैं ये खुद के हैं हो सकता है किसी विद्वान के अपने मत हों ।
क्रमशः 

Friday, July 15, 2016

पाराशर के अनुसार ग्रह दृष्टि

पश्यन्ति सप्तमं सर्वे शनि जीव कुजः पुनः । 
विशेषतश्च त्रिदशत्रिकोणचतुरष्टमान् ||
भावः - यहाँ पर ग्रहों की दृष्टि के बारे में बतलाते हुए पाराशर जी का कहना है कि सभी ग्रह सप्तम स्थान को देखते हैं 
मतलब यह की ग्रह जहां पर है उस स्थान से सप्तम स्थान को देखेगा
इसमें विद्वानों को कई जगह संदेह उत्पन्न होता है 
१- क्या सप्तम के साथ साथ उस स्थान पर बैठे ग्रह को देखेगा?
२- क्या उस भाव के सम्पूर्ण अंश पर अपना प्रभाव डालेगा?
३- क्या उस भाव के सम्पूर्ण फलों को प्रभावित करेगा?
इन सभी विषयों का  यदि क्रमशः विचार करें तो विषय स्पष्ट हो जाएगा 
प्रथम तो यह कि ग्रह की दृष्टि का प्रभाव भाव या ग्रह या दोनों पर 
इसके विषय में पूर्वाचार्यों का एकमत है कि भाव और ग्रह दोनों पर दृष्टि का प्रभाव रहेगा । 
इसमें कुछ तर्क जरूर हैं जो विचारणीय भी अवश्य हैं । ठीक है कि दृष्टि दोनों पर होगी परन्तु क्या दोनों पर प्रभाव पूरी तरह से होगा ? इसको यदि विस्तार में समझे तो स्पष्ट होगा की भाव और ग्रह के अपने राशि अंश कला  विकला आदि मान  होते हैं। यदि ग्रह संधि में है या भाव से दूर है तो उस पर दृष्टि तो रहेगी पर पूर्ण रूप से प्रभाव नहीं होगा। इस तरह से फल कथन की परम्परा यद्यपि कम दिखाई देती है परन्तु इसको नकारा नहीं जा सकता। तो हम कह सकते हैं कि यदि  दृष्ट ग्रह  भाव मध्य में नहीं है तो उस पर दृष्टी का प्रभाव पूरा नहीं होगा। 
अब इसी के दूसरे अंश पर विचार करते हैं कि देखने वाला ग्रह यदि स्वयं भाव से दूर हो या निम्नांश का हो तो भी प्रभाव कम होगा और शायद नहीं भी होगा।   इस विषय में आचार्यो को अवश्य विचार करना चाहिए यदि ऐसा नहीं द्वादश भाव और संधि की गणितागत कल्पना भी प्रश्न चिह्न में आ जाएगी ग्रहों का संधि में जाना भी असत्य हो जायेगा। दृष्टि विचार बहुत ही मह त्त्वपूर्ण है इसका विचार  क्रमशः -------- 
 



Saturday, July 09, 2016

लघु पाराशरी सिद्धांत

                           लघु पाराशरी सिद्धांत
फलित ज्योतिष में लघु पाराशरी का अत्यन्त महत्त्व और योगदान है। इसमें फलित ज्योतिष के पुष्पों को बहुत ही सरल व रोचक ढंग से प्रस्तुत किया गया है। कई भाषाओं में आज इसकी टीकाएं उपलब्ध हैं ।
इस ब्लॉग के माध्यम से उन्हीं सिद्धांतों को सोदाहरण प्रस्तुत करने का प्रयास किया जा रहा है। इसके साथ ही सुधी पाठकों से निवेदन है कि अपने सुझाव और विचार जरूर प्रेषित करें।
प्रथम सिद्धांत
                        फलानि नक्षत्रदशा प्रकारेण विवृण्महे । 
                         दशा विंशोत्तरी ग्राह्या नाष्टोत्तरी मता ॥ 
व्याख्या - फलों के विवरण में  ग्रन्थकार ने स्पष्ट रूप से विंशोत्तरी को स्वीकार किया है अन्य सभी दशाओं को अष्टोत्तरी को कह देने मात्र से अस्वीकार कर दिया है । इसके पीछे सभी विद्वान अपना अपना तर्क देते हैं
जैसे - कुछ विद्वानों का मानना है कि विंशोत्तरी १२० वर्षो के फल को सूचित करती है जो की मनुष्य की परमायु के अनुसार है।
कुछ लोगों का मानना है की अष्टोत्तरी कुछ शर्तों के अनुसार लागू होती है । मेरा व्यक्तिगत शास्त्र के अनुशीलन का अनुभव है की विंशोत्तरी सरल प्रभावी और स्पष्ट है । अब ग्रन्थकार के अनुसार यह भी एक चिंतन आता है कि यहाँ पर दिए गए सभी सिद्धांत विंशोत्तरी के अनुसार ही लिए जाएँ अर्थात अन्यान्य स्थानों पर यदि कोई अनुभवी विद्वान अन्य दशाओं का प्रयोग करता है तो मना नहीं है। यद्यपि आज भी यह अनुसंधान का विषय है कि विंशोत्तरी की दशा पद्धति का निर्माण किन नियमों के अनुसार है । उसमे दशाधिप के वर्षों का निर्णय किसके अनुसार लिया गया यह भी नहीं स्पष्ट है ।
क्रमशः -----