Saturday, July 09, 2016

लघु पाराशरी सिद्धांत

                           लघु पाराशरी सिद्धांत
फलित ज्योतिष में लघु पाराशरी का अत्यन्त महत्त्व और योगदान है। इसमें फलित ज्योतिष के पुष्पों को बहुत ही सरल व रोचक ढंग से प्रस्तुत किया गया है। कई भाषाओं में आज इसकी टीकाएं उपलब्ध हैं ।
इस ब्लॉग के माध्यम से उन्हीं सिद्धांतों को सोदाहरण प्रस्तुत करने का प्रयास किया जा रहा है। इसके साथ ही सुधी पाठकों से निवेदन है कि अपने सुझाव और विचार जरूर प्रेषित करें।
प्रथम सिद्धांत
                        फलानि नक्षत्रदशा प्रकारेण विवृण्महे । 
                         दशा विंशोत्तरी ग्राह्या नाष्टोत्तरी मता ॥ 
व्याख्या - फलों के विवरण में  ग्रन्थकार ने स्पष्ट रूप से विंशोत्तरी को स्वीकार किया है अन्य सभी दशाओं को अष्टोत्तरी को कह देने मात्र से अस्वीकार कर दिया है । इसके पीछे सभी विद्वान अपना अपना तर्क देते हैं
जैसे - कुछ विद्वानों का मानना है कि विंशोत्तरी १२० वर्षो के फल को सूचित करती है जो की मनुष्य की परमायु के अनुसार है।
कुछ लोगों का मानना है की अष्टोत्तरी कुछ शर्तों के अनुसार लागू होती है । मेरा व्यक्तिगत शास्त्र के अनुशीलन का अनुभव है की विंशोत्तरी सरल प्रभावी और स्पष्ट है । अब ग्रन्थकार के अनुसार यह भी एक चिंतन आता है कि यहाँ पर दिए गए सभी सिद्धांत विंशोत्तरी के अनुसार ही लिए जाएँ अर्थात अन्यान्य स्थानों पर यदि कोई अनुभवी विद्वान अन्य दशाओं का प्रयोग करता है तो मना नहीं है। यद्यपि आज भी यह अनुसंधान का विषय है कि विंशोत्तरी की दशा पद्धति का निर्माण किन नियमों के अनुसार है । उसमे दशाधिप के वर्षों का निर्णय किसके अनुसार लिया गया यह भी नहीं स्पष्ट है ।
क्रमशः -----

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