Wednesday, July 14, 2010

मंत्र

मंत्र
आज हम  कुछ चीजों पर तो मन्त्रों का अस्तित्व स्वीकार करते हैं और कुछ स्थानों पर नहीं | यह भारत भूमि की ही विशेषता है जहाँ यह विज्ञान मानव जीवन के लिए सबसे ज्यादा उपयोगी हुआ| व्याकरण के अनुसार "मननात त्रायते इति मन्त्रः'' अर्थात बार बार मनन करने से और जप करने से जो फलीभूत होता है वह मंत्र कहलाता है | प्राचीन काल से ही मानव सुख की खोज में है हर मनुष्य अपने अनुसार सुख की कल्पना भी करता है कोई धन से सुखी ,कोई बल,कोई विद्या और कोई स्वास्थ्य से सुख की कल्पना करता है | इस खोज के उपरांत जब मानव अपने इप्सित वस्तु को प्राप्त कर लेता है तब भी वह सुखी नहीं होता | वस्तुतः हमारे ऋषियों का कहना है जीव सुख की खोज में नहीं अपितु आनंद की खोज में है और आनंद को वह नश्वर वस्तुओं में खोजता है अब यदि अमुक वस्तु में आनंद होता तो उस वस्तु का स्वामी तो बहुत ही सुखी होता | अर्थात मानव वस्तु से सुखी नहीं होता है | अब यदि मनुष्य के दुःख या सुख के कारण पर विचार करें तो यह ज्ञात होता है कि '' मन एव मनुष्यानाम कारणं बंध मोक्षयो:'' देवी भागवत
मन ही मनुष्य के दुःख और सुख का कारण है | अब यदि मन ही मनुष्य के दुःख या सुख का कारण है मन से कैसे सुख प्राप्त करें ?
इसके लिए योगियों ने योग,भक्तों ने भक्ति ,वैराग्य आदि मार्गों का सहारा लिया | सभी ऋषियों और मुनियों ने आनंद प्राप्ति के अनेक मार्ग बतलाये | जैसे - ''योगः चित्त वृत्ति निरोधः '' पातंजल योग प्रदीप में बताया गया कि योग अर्थात चित्त कि वृत्तियों का निरोध करना | उसी मार्ग का यह एक साधन है मन्त्र साधना मानव हमेशा ही विषयों का खोजी रहा है वह अपने अनुसार अपनी आवश्यकताओं कि पूर्ति हेतु मन्त्र के भी कई प्रयोग निकलता गया | आज हम कई रूप में मन्त्रों को प्राप्त कर रहे हैं | मन्त्रों के कई भेद है | हर समाज में अपने मंत्र है | हर धर्म में मन्त्रों का एक विशाल संग्रह देखा जा सकता है | मन्त्रों कि भाषा और prayog  भी अलग-अलग हैं और उन सभी मंत्रो का प्रभाव भी व्याप्त है | यद्यपि आज कई तथा कथित मन्त्र ज्ञाता लोग मन्त्रों के नाम पर लोगों को बेवकूफ भी बना रहे हैं और हम पढ़-लिखकर भी मूर्खो कि मूर्खता में आ  जाते हैं...............  

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